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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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प्रथमोऽध्यायः । ५३

इसी लिये पारद के संस्कारों की हमारे प्राचीन रसशास्त्रों में पूर्ण व्यवस्था की गई है जिससे ये दोष कम हों तथा द्रव्यान्तर संयोग से रोगनाशक व शक्तिप्रद गुण उत्पन्न हो जावें । पारद का विषप्रभाव तो स्वाभाविक है । जब खान से पारद निकलता है उस समय उसके साथ में संखिया, एण्टिमनी भी निकलते हैं । ये दोनों द्रव्य भयङ्कर विष हैं तथा उड़न शील भी हैं इस लिये पारद की शुद्धि करते समय इनकी अशुद्धियों को दूर करने का भी अवश्य ध्यान रखना चाहिये ।

पारद में दो यौगिक दोष नाग (Lead) और वङ्ग ( Tin ) के माने गये हैं। यथा—

यौगिकौ नागवङ्गौ द्वौ तौ जाड्याध्मानकुष्ठदौ ?

ये आधुनिक दृष्टि से भी ठीक हैं । घोष की मेटेरिया मेडिका ऐण्ड थेराप्युटिक्स नामक ग्रन्थ में लिखा है कि पारद में लेड ( Lead ) टिन ( Tin ) तथा अन्य धातुओं की अशुद्धियां भी मिली रहती हैं यथा—Impurites—Lead Tin and other metals ) ।

अन्य धातुओं के विषय में लाडर ब्रण्टन नाम के विद्वान् ने अपने फार्माकोलोजी थेराप्युटिक्स एण्ड मेटेरिया मेडिका नामक ग्रन्थ के पृष्ठ ६९१ पर लिखा है कि "Other metals especially Lead Arsenic and Antimony may be present.

अर्थात् अन्य अशुद्धियों में लेड ( नाग ) आर्सेनिक ( संखिया ) एण्टिमनी ( स्रोतोऽञ्जन ) हो सकते हैं । इन अवतरणों से स्पष्ट है कि पारद में अन्य धातु मिले रहते हैं अत एव मल दोष को मानना सर्वथा सत्य तथा ज्ञातव्य है ।

पारद के सप्तकञ्चुक

उपर्युक्त दोषों के अतिरिक्त पारद में सप्तकञ्चुक दोष भी माने गये हैं । इनको रसशास्त्र में औपाधिक माना गया है ।

औपाधिकाः पुनश्चान्ये कीर्तिताः सप्तकञ्चुकाः ।
पर्पटी पाटिनी भेदी द्रावी मलकरी तथा ।
अन्धकारी तथा ध्वांक्षी विज्ञेयाः सप्तकञ्चुकाः ॥

सप्तकञ्चुक क्या है ?—आधुनिक रसायन और खनिज विज्ञान के परिशीलन से पता चलता है कि पारद प्रायः सब धातुओं से भारी है । जब यह अन्य धातुओं के साथ मिलता है जैसा कि इसी ग्रन्थ में कहा है—

काष्ठौषध्यो नागे नागो वङ्गेऽथ वङ्गमपि शुल्वे ।
शुल्वं तारे तारं कनके कनकञ्च लीयते सूते ॥

तब उसे पारदीय मिश्रक ( Allooy of Mercury ) कहते हैं ।

इस अवस्था में पारद के अन्दर मिली हुई धातुएँ प्रायः पारद के ऊपर आवरण की भांति तैरती रहती हैं । इस प्रकार के आवरण को कञ्चुक कह सकते हैं । पारद