झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
by वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध
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परिचय
दीवान आनन्दराय मेरे परदादा थे। रानी लक्ष्मीबाई की ओर से
लड़ते लड़ते सन् १८५८ में मऊ की लड़ाई में मारे गये थे। जब मेरी पर-
दादी का देहान्त हुआ, मैं आठ-दस वर्ष का था। तब परदादी से रानी
के विषय में बहुत सी कहानियां सुना करता था। उन्होंने रानी को देखा
था।
उन कहानियो की धरोहर मेरी दादी के पास रही। वह समय-समय
पर उनसे मुझको मिलती रही। जब दादी का देहान्त हुआ, मुझको
वकालत आरम्भ किये छः वर्ष के लगभग हो चुके थे।
वह धरोहर अद्भुत होते हुये भी अस्पष्ट थी और उसकी रूपरेखा
धुंघली, तथा सत्य के आधार पर कम और भक्ति के ऊपर अधिक।
इधर इतिहास के अध्ययन और तथ्य के अनुशीलन ने उस धरोहर के
मूल्य को कम कर दिया। सामने केवल पारसनीस की पुस्तक 'रानी
लक्ष्मीबाई का जीवन चरित्र' थी। वह इतिहास का कङ्काल मात्र न थी,
परन्तु दादी-परदादी की बतलाई हुई परम्परा के विरुद्ध थी। पारसनीस
के अन्वेषण काफी मूल्यवान होते हुये भी उनका विचार कि रानी झांसी
का प्रबन्ध अङ्गरेजो की ओर से 'गदर' के जमाने में करती रही, परदादी
और दादी की बतलाई हुई परम्पराओं के सामने मन में खपता नही था।
तो भी मैं सोचता था, शायद ये परम्पराये जनता के इच्छा—संकल्पो
(wishful thinking) का फल है, इसलिये छुटपन, से जिस मूर्ति
की मन में निष्ठापूर्वक पूजा करता चला आ रहा था, उसके प्रति कुछ
नास्तिकता उत्पन्न हो गई।
सुनता रहता था कि रानी स्वराज्य के लिये लड़ी थी, पारसनीस के
ग्रन्थ मे पढा कि उनका शौर्य विवशता की परिस्थिति में उत्पन्न हुआ था !
मैं जब वोर्डिंग हाऊस के जीवन में था, एक रात स्वप्न देखा कि हॉकी-
ग्राउन्ड पर युद्ध हो रहा है और मैं रानी की तरफ से, 'स्वराज्य' के लिये
लड़ता हुआ घायल हो गया हूँ, तब जागने पर बड़ा अचम्भा हुआ,
क्योकि खेल में उस दिन हॉकी का डण्डा भी नही खाया था।
यह स्वप्न भी मुझको प्राय दिक किया करता था।