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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

by रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त)

DevanagariHindipublished508 pages

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( १६ )
समझाते हैं कि ब्रह्मा का लेख झूठा नहीं होने देना चाहिए। इस पर रामचन्द्र सुलोचना
को आश्वासन देते हैं कि अगले जन्म में तुम अपने पति के साथ चिरकाल तक सुखमय
जीवन व्यतीत करने के उपरांत वैकुंठ-धाम प्राप्त करोगी। इसके पश्चात् सुलोचना राम से
अपने पति का शरीर माँगती हैं । तब सुग्रीव उसे ताना देते हुए कहता है—'यदि तुम
पतिव्रता हो, तो अपने मृत पति से वार्तालाप करो।' सुलोचना इस चुनौती को स्वीकार
करती हैं और युद्ध-भूमि में पड़े हुए अपने पति के शव के पास जाकर बड़े ओजपूर्ण
शब्दों में कहती हैं—'यदि मैं मन, वचन, कर्म से अपने पति की सच्ची भक्ति करती हूँ,
तो मेरे पति सजीव होकर मुझसे वार्तालाप करें।' तब मेघनाद का शव आँखें खोलकर
कहता है—'हे प्रिये ! मेरे पिता ने ही मुझे मारा है। नहीं तो और किसकी ऐसी शक्ति थी
कि मुझे मार सके, काल की गति प्रबल है। इसलिए चिन्ता मत करो।' इतना
कहकर इन्द्रजीत की आँखें सदा के लिए बंद हो जाती हैं। इसके पश्चात् सती सुलोचना
अपने पति के शव को साथ लेकर जाती हैं और उसके साथ सती होकर देवलोक में
पहुँच जाती हैं।
कला-पक्ष--कला की दृष्टि से भी रंगनाथ रामायण उच्च कोटि का महाकाव्य है।
कला के उत्कृष्ट चमत्कार इसके प्रत्येक पृष्ठ में दृष्टिगोचर होते हैं। कवि संस्कृत के
काव्य-शास्त्र के निष्णात विद्वान् होने के कारण उक्ति-वैचित्र्य एव अर्थगौरव, इन दोनो
का उचित अनुपात बनाये रखने में सर्वथा सफल हुए हैं। उनकी कला-साधना में पग-पग
पर उनका हाथ बँटानेवाले अनुप्रास एवं यमक अलंकारों की छटा कवि के अगाध
पांडित्य एवं भाषा पर उनके विलक्षण अधिकार का प्रमाण प्रस्तुत करती है। भावों की
मार्मिक अभिव्यंजना के लिए प्रयुक्त अर्थालंकार इतने स्वाभाविक हैं कि हम कवि की
औचित्य-प्रियता पर मुग्ध हो जाते हैं। रंगनाथ रामायण की भाषा विलक्षण माधुर्य एवं
गंभीरता से परिपूर्ण है । तेलुगु की साहित्यिक भाषा के जिन दो रूपों की चर्चा पहले की
गई है, उन दोनो रूपों का सुन्दर सम्मेलन इस काव्य में हो गया है। कवि
का तेलुगु एवं संस्कृत दोनो भाषाओ पर पूरा-पूरा अधिकार था और दोनो भाषाओ के
शब्द-भांडार उनको आदेश का पालन के लिए सर्वथा प्रस्तुत रहते दिखाई देते हैं।
कवि ने तेलुगु की सजीव एवं मधुर मुहावरेदार भाषा के साथ संस्कृत-शब्दो का
ऐसा सुन्दर मेल कराया है कि भाषा में मणि-कांचन-योग की-सी शोभा आ गई है।
इसकी भाषा का एक नमूना नीचे दिया जाता है—
राज-तिलक चेतोविनिर्मलशिष्ट विशिष्ट, गौतम जावालिकश्यप वामदेवाहुलो
वरमुनीश्वरुल नामादि बहुवेद चतुर वोवकुल भरतुडु रप्पिचि भय भुक्तु लोप्प, परम सम्मद
वचोभंगुलु, मेरय 'श्री रामुनकु पट्टाभिषेकंबु सेयुडारूढ नियतितो' ननि पलुक वारु पूनि
मंगल तूर्य मुलु मोयुचुंड, जानकी रामुल चडुरोप्प तेच्चि रमणीयतरमैन रत्नपीठमुन, कोडरोप्प
निरुवुर कूर्चुंड बनि चि मानित वेदोक्त मंत्र पूर्वकमुग अभिषेकंवु करमथिचेय ना रामुनीदल
ना पूर्णवारि धार डग्गएनप्पुडु तग चूडनोप्पे गीर्वाण मुत्युलु कीर्तनल सेय पार्वती सहितुडै
प्रणुनिपनोप्पु अंगजहर मौलि नमल नैतोरुगु गंगा नदियु वोले कमनीय मगुचु ना तीर्थचरुलु