रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
by पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी)
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व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़ने से बड़े भयंकर परिणाम होते हैं। इस प्रकार
के समाचार सुनकर मैंने सबको एकत्रित किया और खूब फटकारा। सब अपनी त्रुटि
समझकर पछताए और प्रीतिपूर्वक आपस में मिलकर कार्य करने लगे। पर ऐसी
अवस्था हो गई थी कि दलबंदी की नौबत आ गई थी। इस प्रकार से तो दलबंदी
हो ही गई थी। पर मुझ पर सब की श्रद्धा थी और मेरी राय को सब मान लेते
थे। सब कुछ होने पर भी मुझे किसी ओर से किसी प्रकार का संदेह न था। किंतु
परमात्मा को ऐसा ही स्वीकार था, जो इस अवस्था का दर्शन करना पड़ा।
गिरफ्तारी
काकोरी डकैती होने के बाद से ही पुलिस बहुत सचेत हुई। बड़े जोरों के
साथ जाँच आरंभ हो गई। शाहजहाँपुर में कुछ नए व्यक्तियों के दर्शन हुए।
पुलिस के कुछ विशेष सदस्य मुझसे भी मिले। चारों ओर शहर में यही चर्चा थी
कि रेलवे डकैती किसने कर ली ? उन्हीं दिनों शहर में डकैती के एक-दो नोट
निकल आए, अब तो पुलिस-जाँच-पड़ताल और भी बढ़ने लगी। कई मित्रों ने
मुझसे कहा भी कि सतर्क रहो। दो एक सज्जनों ने निश्चित समाचार दिया कि
मेरी गिरफ्तारी जरूर हो जाएगी। मेरी समझ में कुछ न आया। मैंने विचार किया
कि यदि गिरफ्तारी हो भी गई तो पुलिस को मेरे विरुद्ध कुछ भी प्रमाण न मिल
सकेगा। अपनी बुद्धिमत्ता पर कुछ अधिक विश्वास था। अपनी बुद्धि के सामने
दूसरों की बुद्धि को तुच्छ समझता था। कुछ यह भी विचार था कि देश की
सहानुभूति की परीक्षा की जाए। जिस देश पर हम अपना बलिदान देने को तैयार
हैं, उस देश के वासी हमारे साथ कितनी सहानुभूति रखते हैं ? कुछ जेल का
अनुभव भी प्राप्त करना था। वास्तव में, मैं काम करते-करते थक गया था।
भविष्य के कार्यों में अधिक नर-हत्या का ध्यान करके मैं हतबुद्धि-सा हो गया
था। मैंने किसी के कहने की कोई भी चिंता न की।
रात्रि के समय ग्यारह बजे के लगभग एक मित्र के यहाँ से अपने घर पर