राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 45 of 307
Read in context३२ राजयोग
गया। रस्सा ऊपर बाँधकर वह नीचे उतरा और भाग खडा हुआ। हमारी इस देह में श्वास-प्रश्वास की गति मानो रेशमी सूत है। इसका धारण या संयम कर सकने पर पहले स्नायविक शक्तिप्रवाहरूप (nervous currents) सूत का बडल, फिर मनोवृत्तिरूप डोरी और अन्त मे प्राणरूप रस्से को पकड सकते हैं। प्राणो को जीत लेने पर मुक्ति प्राप्त होती है।
हम अपने शरीर के सम्बन्ध मे बडे अज्ञ हैं, कुछ जानकारी रखना भी हमे सम्भव नही मालूम पडता। बहुत हुआ तो हम मृत-देह को चीर-फाडकर देख सकते है कि उसके भीतर क्या है और क्या नही, और कोई-कोई इसके लिए किसी जीवित पशु की देह ले सकते हैं। पर उससे हमारे अपने शरीर का कोई सम्बन्ध नही। हम अपने शरीर के सम्बन्ध मे बहुत कम जानते हैं। इसका कारण क्या है ? यह कि हम मन को उतनी दूर तक एकाग्र नही कर सकते, जिससे हम शरीर के भीतर की अति सूक्ष्म गतियो तक को समझ सके। मन जब बाह्य विषयो का परित्याग कर देह के भीतर प्रविष्ट होता है और अत्यन्त सूक्ष्मावस्था प्राप्त करता है, तभी हम उन गतियो को जान सकते हैं। इस प्रकार सूक्ष्म अनुभूतिसम्पन्न होने के लिए हमे पहले स्थूल से आरम्भ करना होगा। देखना होगा, सारे शरीर-यन्त्र को चलाता कौन है, और उसे अपने वश मे लाना होगा। वह प्राण है, इसमे कोई सन्देह नही। श्वास-प्रश्वास ही उस प्राण-शक्ति का प्रत्यक्ष परिदृश्यमान रूप है। अब, श्वास-प्रश्वास के साथ धीरे-धीरे शरीर के भीतर प्रवेश करना होगा। इसी से हम देह के भीतर की सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियो के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त कर सकेगे और समझ सकेगे कि स्नायविक शक्तिप्रवाह किस तरह