राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextचतुर्थ अध्याय
कैवल्यपाद
जन्मोषधिमन्त्रतपः समाधिजा सिद्धयः ॥१॥
सूत्रार्थ—सिद्धियां जन्म, औषधि, मन्त्र, तपस्या और समाधि से उत्पन्न होती हैं।
व्याख्या—कभी-कभी मनुष्य पूर्वजन्म में प्राप्त सिद्धि को लेकर जन्म ग्रहण करता है। इस बार वह मानो उनके फल का भोग करने के लिए ही जन्म लेता है। सांख्यदर्शन के पितृ-स्वरूप कपिल के बारे में कहा है कि वे जन्म से ही सिद्ध थे। 'सिद्ध' शब्द का अर्थ है—जो कृतकार्य हो चुके हैं।
योगीजन कहते हैं कि रसायनविद्या अर्थात् औषधि आदि के द्वारा ये सब शक्तियां प्राप्त हो सकती हैं। तुम सभी जानते हो कि रसायनविद्या का प्रारम्भ आलकेमि* से हुआ। मनुष्य पारस-पत्थर (philosopher's stone), सजीवनी अमृत (elixir of life)† आदि का अन्वेषण करते थे। भारतवर्ष में 'रसायन' नामक एक सम्प्रदाय था। उनका यह मत था कि सूक्ष्मतरत्व-प्रियता, ज्ञान, आध्यात्मिकता, धर्म—ये सब सत्य (अच्छे) अवश्य हैं, पर उन्हें प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है यह शरीर। यदि बीच-बीच में शरीर भग्न अर्थात् मृत्युग्रस्त होता
* आलकेमि—तांबा आदि कम कीमतवाली धातुओं से सोना-चांदी आदि बनाने की विद्या। पुराने यूरोप में गुप्त रूप से इस विद्या का बहुत प्रचार था।
† 'सजीवनी अमृत' का अर्थ है एक प्रकार का काल्पनिक रस जिससे मनुष्य अमर हो सकता है।