राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र-३
२५३
क्षणतत्क्रमयो संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५३॥
सूत्रार्थ— क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।
व्याख्या— देवता, स्वर्ग और शक्तियो से बचने का फिर उपाय क्या है? उपाय है विवेक—सदसत् विचार। इस विवेक-ज्ञान को दृढ करने के उद्देश्य से ही इस सयम का उपदेश दिया गया है। 'क्षण' का अर्थ है काल का सूक्ष्मतम अग्र। एक क्षण के पहले जो क्षण बीत चुका है, और उसके बाद जो क्षण प्रकट होगा—इस लगातार सिलसिले को 'क्रम' कहते हैं। अतः उपर्युक्त विवेकजनित ज्ञान को दृढ करने के लिए क्षण और उसके क्रम में सयम करना होगा।
जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्ति ॥५४॥
सूत्रार्थ— जाति, लक्षण और देशभेद से जिन वस्तुओ का भेद न किए जा सकने के कारण जो तुल्य प्रतीत होती हैं, उनको भी इस उपर्युक्त संयम द्वारा अलग करके जाना जा सकता है।
व्याख्या— हम जो दुख भोगते हैं, वह अज्ञान से, सत्य और असत्य के अविवेक से उत्पन्न होता है। हम सभी बुरे को भला समझते हैं और स्वप्न को वास्तविक। एकमात्र आत्मा ही सत्य है, पर हम यह भूल गए है। शरीर एक मिथ्या स्वप्न मात्र है, पर हम सोचते है कि हम शरीर है। यह अविवेक ही दुःख का कारण है। और यह अविवेक अविद्या से उत्पन्न होता है। विवेक के उदय के साथ ही बल भी आता है, और तभी हम इस शरीर, स्वर्ग तथा देवता आदि की कल्पनाओ को त्यागने मे समर्थ होते हैं। जाति, चिह्न और स्थान के द्वारा हम वस्तुओं को अलग करते हैं। उदाहरणार्थ, एक गाय की बात ले लो। गाय का कुत्ते से जो