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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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१६४ राजयोग

जायगा। किन्तु बाद में इसी से प्राणायाम नामक एक विशेष विद्या की उत्पत्ति हो गई। अब हम देखेंगे कि ये सब बाद के योगीगण उसके बारे मे क्या कहते हैं। इस सम्बन्ध में मैंने पहले ही कुछ कहा है, यहाँ पर उसकी कुछ पुनरावृत्ति करने से वह मन में पक्का बैठ जायगा। पहले तो, यह ध्यान रखना होगा कि यह प्राण ठीक श्वास-प्रश्वास नहीं है, वरन् जिस शक्ति के बल से श्वास-प्रश्वास को गति होती है, जो वस्तुत श्वास-प्रश्वास की भी जीवनी-शक्ति है, वही प्राण है। फिर, यह 'प्राण' शब्द सब इन्द्रियो के लिए भी व्यवहार मे लाया जाता है, वे सब-की-सब प्राण कहलाती हैं, मन को भी प्राण कहा जाता है॥ अतएव हम देखते है कि प्राण का अर्थ है शक्ति। तो भी इसे हम शक्ति नाम नहीं दे सकते, क्योकि शक्ति तो इस प्राण की अभिव्यक्ति मात्र है। यह प्राण ही शक्ति तथा नाना प्रकार की गति के रूप मे प्रकाशित होता है। चित्त यन्त्रस्वरूप होकर चारो ओर से प्राण को भीतर खींचता है और उससे शरीर-रक्षा करनेवाली विभिन्न जीवनी-शक्तियाँ तथा विचार, इच्छा एवं अन्यान्य सब शक्तियाँ उत्पन्न करता है। पूर्वोक्त प्राणायाम-क्रिया से हम शरीर की समस्त भिन्न-भिन्न गतियो को तथा शरीर के अन्तर्गत समस्त भिन्न-भिन्न स्नायविक शक्तिप्रवाहो को वश में ला सकते है। पहले हम उनको पहचानने लगते है, उनका साक्षात् अनुभव करने लगते है, और फिर धीरे-धीरे उन पर अधिकार प्राप्त करते जाते हैं—उनको वशीभूत करने में सफल होते जाते हैं। पतंजलि के बाद के इन योगियो के मतानुसार मनुष्य-देह मे तीन मुख्य प्राण-प्रवाह अर्थात् नाडियाँ हैं। वे एक को इड़ा, दूसरे को पिंगला और तीसरे को सुषुम्ना कहते