राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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परे की यह अतीन्द्रिय अवस्था कभी-कभी ऐसे व्यक्ति को अचानक प्राप्त हो जाती है, जो उसका विज्ञान नही जानता। वह मानो उस ज्ञानातीत राज्य मे ढकेल दिया जाता है। और जब उसे इस प्रकार अचानक अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति होती है, तो वह साधारणत सोचता है कि वह ज्ञान कही बाहर से आया है। इसी से यह स्पष्ट है कि यह पारमार्थिक ज्ञान सारे देशो मे वस्तुत एक होने पर भी, किसी देश में वह देवदूत से, किसी देश में देवविशेष से, अथवा फिर कही साक्षात् भगवान् से प्राप्त हुआ क्यो सुना जाता है। इसका तात्पर्य क्या है? यही कि मन ने अपनी प्रकृति के अनुसार ही अपने भीतर से उस ज्ञान को प्राप्त किया है, किन्तु जिन्होने उसे पाया है, उन्होने अपनी-अपनी शिक्षा और विश्वास के अनुसार इस बात का वर्णन किया है कि उन्हे वह ज्ञान कैसे मिला। असल बात तो यह है कि ये सभी उस ज्ञानातीत अवस्था मे अचानक जा पडे थे।
योगीगण कहते है कि उस ज्ञानातीत अवस्था मे अचानक जा पडने से एक भारी धोखे की आशका रहती है। अनेक स्थलो मे तो मस्तिष्क के बिलकुल नष्ट हो जाने की सम्भावना रहती है। और भी देखोगे, जिन सब मनुष्यो ने अचानक इस अतीन्द्रिय ज्ञान को पाया है, पर उसके वैज्ञानिक तत्त्व को नहीं समझा, वे कितने भी बडे क्यो न हो, सच पूछा जाय तो उन्होने अँधेरे में टटोला है, और उनके उस ज्ञान के साथ कुछ-न-कुछ विचित्र कुसस्कार मिला हुआ है ही। उन्होने अपने आपको भ्रामक दर्शनो के लिए खोल रखा था।
जो हो, हम कई महापुरुषो के जीवन-चरित का अध्ययन करने पर देखते है कि अचानक इन्द्रियातीत राज्य में जा पड़ने