राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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हैं। मानव-जीवन के सारे भाव इस नि स्वार्थपरतारूप एकमात्र भाव के अन्दर ढाले जा सकते हैं। मैं क्यों स्वार्थशून्य होऊँ? नि स्वार्थ होने की आवश्यकता क्या? और किस शक्ति के बल से मैं नि स्वार्थ होऊँ? तुम कहते हो, "मैं युक्तिवादी हूँ, मैं उपयोगितावादी हूँ," लेकिन यदि तुम मुझे इसकी युक्ति न दिखला सको कि तुम जगत् का कल्याण-साधन क्यों करोगे, तो मैं तुम्हे अयुक्तिक कहूँगा। मैं क्यों नि स्वार्थ होऊँ, कारण बताओ, क्यों न मैं बुद्धिहीन पशु के समान आचरण करूँ? नि स्वार्थपरता कवित्व के हिसाब से अवश्य बहुत सुन्दर हो सकती है, किन्तु कवित्व तो युक्ति नहीं है। मुझे युक्ति दिखलाओ, मैं क्यों नि स्वार्थपर होऊँ? क्यों मैं भला बनूँ? यदि कहो, 'अमुक यह बात कहते हैं, इसलिए ऐसा करो'—तो यह कोई जवाब नहीं है, मैं ऐसे किसी व्यक्तिविशेष की बात नहीं मानता। मेरे नि स्वार्थ होने से मेरा कल्याण कहाँ? यदि 'कल्याण' से अधिक परिमाण में सुख समझा जाय, तब तो स्वार्थपर होने में ही मेरा कल्याण है। मैं तो दूसरो को धोखा देकर और दूसरे का सर्वस्व चुराकर सबसे अधिक सुख पा सकता हूँ। उपयोगितावादी इसका क्या उत्तर देंगे? वे इसका कुछ भी उत्तर नहीं दे सकते। इसका यथार्थ उत्तर यह है कि यह परिदृश्यमान जगत् अनन्त समुद्र में एक छोटासा बुलबुला है—अनन्त जंजीर की एक छोटीसी कड़ी है। जिन्होंने जगत् में नि स्वार्थपरता का प्रचार किया था और मानव-जाति को उसकी शिक्षा दी थी, उन्होंने यह तत्त्व कहाँ से पाया? हम जानते हैं कि यह सहज ज्ञान द्वारा नहीं प्राप्त हो सकता। सहज ज्ञान से युक्त पशु तो इसे नहीं जानते। विचार-बुद्धि से भी यह नहीं मिल सकता—