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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 686 of 735

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एकोनविंशः सर्गः [६२७]


और टूटी हुई करधनियाँ पड़ी रहती थीं, उसे देखकर मालूम होता था कि वह विलासी है ॥ २५ ॥

स स्वयं चरणरागमपादधे योषितां न च तथा समाहितः ।
लोभ्यमाननयनः श्लथांशुकैर्मेखलागुणपदैर्नितम्बिभिः ॥ २६ ॥

अन्वयः— स स्वयं योषितां चरणरागं आदधे श्लथांशुकैः नितम्बिभिः मेखलागुणपदैः लोभ्यमाननयनः तथा समाहितः च न ।

स इति । सोऽग्निवर्णः स्वयमेव योषितां चरणयो रागं लाक्षारसमादधेऽपं-यामास । किंच श्लथांशुकैः प्रियाङ्गस्पर्शादिति भावः । नितम्बिभिर्नितम्बवद्भि-र्मेखलागुणपदैर्जघनैः । 'पश्चान्नितम्बः स्त्रीकट्याः क्लीबे तु जघनं पुरः' इत्यमरः । लोभ्यमाननयन आकृष्यमाणदृष्टिः सन् तथा समाहितोऽवहितो नादधे । यथा सम्यग्रागरचना स्यादिति भावः ।

भाषार्थ— कभी-कभी वह अग्निवर्ण स्त्रियों के पैर में स्वयं महावर लगाने बैठ जाता था, उसी समय उसकी दृष्टि स्त्रियों के उन नितम्बों पर पड़ जाती थी जिन पर से वस्त्र सरका हुआ रहता था। उन्हें देखकर वह ऐसा मुग्ध हो जाता था कि भलीभांति महावर भी नहीं लगा पाता था ॥ २६ ॥


चुम्बने विपरिवर्तिताधरं हस्तरौधि रशनाविघट्टने ।
विघ्नितेच्छमपि तस्य सर्वतो मन्मथेन्धनमभूद्वधूरतम् ॥ २७ ॥

अन्वयः— चुम्बने विपरिवर्तिताधरं रशनाविघट्टने हस्तरौधि सर्वतः विघ्नितेच्छं अपि वधूरतं तस्य मन्मथेन्धनम् अभूत् ।

चुम्बन इति । चुम्बने प्रवृत्ते सति विपरिवर्तिताधरं परिहृतोष्ठम् । रशनाविघट्टने ग्रन्थिविस्रंसने प्रसक्ते सति हस्तं रुणद्धि वारयतीति हस्तरौधि । इत्थं सर्वत्र विघ्नितेच्छं प्रतिहतमनोरथमपि वधूनां रतं सुरतं तस्याग्निवर्णस्य मन्मथेन्धनं कामोद्दीपनमभूत् ।

भाषार्थ— सम्भोग के समय जब वह स्त्रियों के ओठों को चूमने लगता था, तब वे मुँह फेर लेती थीं । जब कमर की करधनी खोलने लगता था तब हाथ थाम लेती थीं । इस प्रकार वह और कुछ करना चाहता था तो स्त्रियाँ कुछ भी नहीं करने देती थीं फिर भी उसका मन बढ़ता ही गया ॥ २७ ॥


दर्पणेसु परिभोगदर्शिनीर्नर्मपूर्वमनुपृष्ठसंस्थितः ।
छायया स्थितमनोज्ञया वधूर्ह्रीनिमीलितमुखीश्चकार सः ॥ २८ ॥