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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 585 of 735

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Page 585

५२६ रघुवंशमहाकाव्ये

अन्वयः—अथ कालः मुनिवेषः (सन्) उपेत्य राघवं प्रोवाच रहःसंवादिनौ आवां यः पश्येत् तं (त्वं) त्यजेः इति।

उपेत्येति। अथ कालोऽन्तको मुनिवेषः सन्नुपेत्य राघवं प्रोवाच। किमित्याह—रहस्येकान्ते संवादिनौ संभाषिणावावां यः पश्येत्। रहस्यभङ्गं कुर्यादित्यर्थः। तं त्यजेरिति।

भाषार्थ—यह सब हो जाने पर एक दिन राम के पास मुनि का वेश बना-कर काल आया और बोला—मैं आपसे एकान्त में कुछ बातें करना चाहता हूँ हम लोगोंकी बातके बीच में जो भी कोई आ जाय उसे आप त्याग दीजिएगा ॥९२॥

तथेति प्रतिपन्नाय विवृतात्मा नृपाय सः।
आचख्यौ दिवमध्यास्व शासनात्परमेष्ठिनः ॥ ९३ ॥

अन्वयः—सः तथा इति प्रतिपन्नाय नृपाय विवृतात्मा (सन्) परमेष्ठिनः शासनात् दिवम् अध्यास्व (इति) आचख्यौ।

तथेति। स कालस्तथेति प्रतिपन्नाय नृपाय रामाय विवृतात्मा प्रकाशितनिजस्वरूपः सन् परमेष्ठिनो ब्रह्मणः शासनाद्दिवमध्यास्वेत्याचख्यौ।

भाषार्थ—राम ने कहा 'अच्छी बात है' तब उसने अपना सच्चा रूप दिखाया और कहा कि ब्रह्मा जी की आज्ञा है कि अब आप चलकर वैकुण्ठ में रहें ॥९३॥

विद्वानपि तयोर्द्वाःस्थः समयं लक्ष्मणोऽभिनत्।
भीतो दुर्वाससः शापाद्रामसंदर्शनार्थिनः ॥ ९४ ॥

अन्वयः—द्वाःस्थः लक्ष्मणः विद्वान् अपि रामसन्दर्शनार्थिनः दुर्वाससः शापात् भीतः (सन्) तयोः समयं अभिनत्।

विद्वानिति। द्वाःस्थो द्वारि नियुक्तो लक्ष्मणो विद्वानपि पूर्वश्लोकोक्तं जानन्नपि रामसन्दर्शनार्थिनो दुर्वाससो मुनेः शापाद्भीतः सन् तयोः कालरामयोः समयं संवादमभिनत् बिभेद।

भाषार्थ—यह बात हो ही रही थी कि दुर्वासा ऋषि आ धमके उन्होंने द्वार-पर बैठे हुए लक्ष्मण से कहा कि अभी जाकर राम से कहो 'मैं आया हूँ' नहीं तो तुम्हारे कुल को अभी शाप दे भस्म कर दूँगा। लक्ष्मण ने जानते हुए भी ऋषि के शाप से डरकर जाकर सूचना दे दी ॥९४॥

स गत्वा सरयूतीरं देहत्यागेन योगवित्।
चकारावितथां भ्रातुः प्रतिज्ञां पूर्वजन्मनः ॥ ९५ ॥