रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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Read in context४६४ रघुवंशमहाकाव्ये
स इति । स रामः ससैन्यस्तूर्यस्वनैरानन्दितपौरवर्गः सन् मूले भवा मौला मन्त्रिवृद्धास्तै रक्षोभिर्हरिभिश्च सह सौधेभ्य उद्गतलाजवर्षामुत्तोरणामन्वयराजधानीमयोध्यां विवेश प्रविष्टवान् ।
**भाषार्थ—**वृद्धमन्त्री राक्षस और वानरों के साथ राम ने अपनी सेना के साथ वंश परम्परागत राजधानी अयोध्या में प्रवेश किया, जो चारों ओर बन्दरवारों से सजाई गई थी जहाँ के श्वेतभवनों से धान की लाई बरस रही थी और जहाँ के निवासी तुरही आदि बाजों को सुन-सुनकर परम प्रसन्न हो रहे थे ॥ १० ॥
सौमित्रिणा सावरजेन मन्दमाधूतबालव्यजनो रथस्थः ।
धृतातपत्रो भरतेन साक्षादुपायसंघात इव प्रवृद्धः ॥ ११ ॥
**अन्वयः—**सावरजेन सौमित्रिणा मन्दमाधूतबालव्यजनः रथस्थः भरतेन धृतातपत्रः प्रवृद्धः साक्षात् उपायसंघात इव पुरं प्रविवेश ।
सौमित्रिणेति । सावरजेन शत्रुघ्नयुक्तेन सौमित्रिणा लक्ष्मणेन मन्दमाधूते बालव्यजने चामरे यस्य स रथस्थो भरतेन धृतातपत्र एवं चतुर्व्यूहो रामः प्रवृद्धः साक्षादुपायानां सामादीनां सङ्घातः समष्टिरिव विवेशेति । पूर्वेण सम्बन्धः ।
**भाषार्थ—**लक्ष्मण और शत्रुघ्न रथ पर बैठ हुए राम पर धीरे-धीरे चंवर डुला रहे थे और भरत अपने हाथ में छत्र लिए हुए थे । इस प्रकार जब राम अपने भाइयों के साथ अयोध्या में प्रवेश किये तब चारों भाई ऐसे जान पड़ रहे थे मानो साम, दाम, दण्ड और भेद ये चारों उपाय इकट्ठे हो गये हों ॥ ११ ॥
प्रासादकालागुरुधूमराजिस्तस्याः पुरो वायुवशेन भिन्ना ।
वनान्निवृत्तेन रघूत्तमेन मुक्ता स्वयं वेणिरिवावभासे ॥ १२ ॥
**अन्वयः—**वायुवशेन भिन्ना प्रासादकालागुरुधूमराजि वनात् निवृत्तेन रघूत्तमेन स्वयं मुक्ता तस्याः पुरः वेणिः इव आबभासे ।
प्रासादेति ! वायुवशेन भिन्ना प्रसादे यः कालागुरुधूमस्तस्य राजिः रेखा वनान्निवृत्तेन रघूत्तमेन रामेण स्वयं मुक्ता तस्याः पुरः पुर्या वेणिरिव अबभासे । पुरोऽपि पतिव्रतासमाधिरुक्तः । (न प्रोषिते तु संस्कुर्यान्न वेणीं च प्रमोचयेत्) इति हारीतः ।
**भाषार्थ—**भवनों के ऊपर वायु से छितराया हुआ काला अगर का धुआँ ऐसा लग रहा था मानों वन से लोट कर राम ने अयोध्या नगरी का जूड़ा खोल दिया हो ॥ १२ ॥
श्वश्रूजनानुष्ठितचारुवेषां कर्णीरथस्थां रघुवीरपत्नीम् ।
प्रासादवातायनदृश्यबन्धैः साकेतनार्योऽञ्जलिभिः प्रणेमुः ॥ १३ ॥