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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 481 of 735

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Page 481

४२२ रघुवंशमहाकाव्ये

**भावार्थ—**जिस प्रकार वादी और प्रतिवादी एक दूसरे की बात को अपनी बात से काटते हुए जीतने के लिए क्रुद्ध हो जाते हैं उसी प्रकार एक दूसरे के अस्त्र को अपने अस्त्र से काटते हुए अपनी-अपनी विजय प्राप्त करने के लिए अत्यन्त क्रुद्ध हो गये ॥ ९२ ॥

विक्रमव्यतिहारेण सामान्याऽभूद्द्वयोरपि ।
जयश्रीरन्तरा वेदिर्मत्तवारणयोरिव ॥ ९३ ॥

**अन्वयः—**जयश्रीः विक्रमव्यतिहारेण द्वयोः अपि अन्तरा वेदी मत्तवारणयोः इव सामान्या अभूत् ।

विक्रमेति । जयश्रीर्विक्रमस्य व्यतिहारेण पर्यायक्रमेणतयोर्द्वयोरपि अन्तरा-मध्ये। अव्ययमेतत्। वेदिर्वेद्याकारा भित्तिर्मत्तवारणयोरिव सामान्या साधारणाऽभूत् नत्वन्यतरनियतेत्यर्थः । अत्र मत्तवारणयोरित्यत्र द्वयोरित्यत्र च “अन्तरान्तरेण युक्ते’ इति द्वितीया न भवति । अन्तराशब्दस्योक्तरीत्यान्यत्रान्वयात् । मध्ये कामपि भित्तिं कृत्वा गजौ योधयन्तीति प्रसिद्धिः ।

**भावार्थ—**कभी राम अपना पराक्रम दिखलाते थे कभी रावण, इसलिए विजयश्री कभी राम के पास जाती थी कभी रावण के पास, उसकी दशा वैसी ही हो गयी थी जैसे लड़ते हुए मतवाले हाथियों के बीच की दिवार की होती है ॥ ९३ ॥

कृतप्रतिकृतप्रीतैस्तयोर्मुक्तां सुरासुरैः ।
परस्परशरव्राताः पुष्पवृष्टिं न सेहिरे ॥ ९४ ॥

**अन्वयः—**कृतप्रतिकृतप्रीतैः सुरासुरैः तयोः मुक्तां पुष्पवृष्टिं परस्परशरव्राताः न सेहिरे ।

कृतेति । स्वयमस्त्रप्रयोगः कृतं प्रतिकृतं परकृतप्रतीकारस्ताभ्यां प्रीतैः सुरासुरैर्यथासंख्यं तयो रामरावणयोर्मुक्तां पुष्पवृष्टिं द्वयीमिति शेषः । परस्परं शरव्रात न सेहिरे । अहमेवालं किं त्वयेति चान्तराल एवेतरबाणवृष्टिरितरेतरपुष्पवृष्टिमवारयदित्यर्थः ।

**भावार्थ—**जब राम बाण चलाते थे या रावण का वार रोकते थे तब देवता उनके ऊपर फूल बरसाने लगते थे और जब राम पर रावण प्रहार करता था या उनका वार रोकता था तब असुर उस पर फूल बरसाते थे, पर ये दोनों इतना अधिक बाण छोड़ते थे कि पुष्प भूमि पर न गिर कर आकाश में ही तितर-बितर हो जाते थे ॥ ९४ ॥