रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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Read in context| ४१६ | रघुवंशमहाकाव्ये |
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नागपाशेन बन्धनं यस्मिन्स तथोक्तः । क्षणक्लेशो दाशरथ्योः रामलक्ष्मणयोः स्वप्नवृत्तः स्वप्नावस्थायां भूत इवाभवत् ।
**भाषार्थ—**उसी समय मेघनाद ने राम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँध लिया, पर गरुण ने आकर उस फन्दे को तत्काल काट दिया । पाश में बँधने का यह क्षण भर का क्लेश भी उन दोनों भाइयों को ऐसा मालूम पड़ा, मानों स्वप्न में हुआ हो ७६ ॥
ततो बिभेद पौलस्त्यः शक्त्या वक्षसि लक्ष्मणम् ।
रामस्त्वनाहतोऽप्यासीद्विदीर्णहृदयः शुचा ॥ ७७ ॥
**अन्वयः—**ततः पौलस्त्यः शक्त्या लक्ष्मणं वक्षसि बिभेद, रामः तु अनाहतः अपि शुचा विदीर्णहृदयः आसीत् ।
तत इति । ततः पौलस्त्यो रावणः शक्त्या कासूनामकेनायुधेन । 'कासूसा-मर्थ्ययोः शक्तिः' इत्यमरः । लक्ष्मणं वक्षसि बिभेद विदारयामास । रामस्त्वना-हतोऽप्यहतोऽपि शुचा शोकेन विदीर्णहृदय आसीत् ।
**भाषार्थ—**तब पुलस्त्य के कुल में उत्पन्न रावण के पुत्र मेघनाद ने खींचकर लक्ष्मण की छाती पर ऐसा शक्तिबाण मारा, कि लक्ष्मण तत्काल गिर गये और उन्हें देखकर यद्यपि राम को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी थी फिर भी उनका हृदय शोक से फटने लगा ॥ ७७ ॥
स मारुतिसमानीतमहौषधिहतव्यथः ।
लङ्कास्त्रीणां पुनश्चक्रे विलापाचार्यकं शरैः ॥ ७८ ॥
**अन्वयः—**स मारुतिसमानीतमहौषधिहतव्यथः (सन् ) पुनः शरैः लङ्कास्त्रीणां विलापाचार्यकं चक्रे ।
स इति । स लक्ष्मणो मारुतिना मरुत्सुतेन हनुमता समानीतया महौषध्या संजीवन्या हतव्यथः सन्पुनः शरैर्लङ्कास्त्रीणां विलापे परिदेवने । 'विलापः परि-देवनम्' इत्यमरः । आचार्यकमाचार्यकर्म "योपधाद्गुरूपोत्तमाद्वुञ्" इति वुञ् । चक्रे । पुनरपि राक्षसाञ्घानेति व्यज्यते ।
**भाषार्थ—**हनुमान् जी तत्काल जाकर धवलागिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाये, जिसके पिलाते ही लक्ष्मण की मूर्च्छा छूट गई और सारी पीड़ा दूर हो गई । फिर उठकर उन्होंने अपने बाणों से अगणित राक्षसों को मारकर लंका की स्त्रियों के रोने में आचार्य का कार्य किया । अर्थात् उनके बाणों से राक्षसों के मारे जाने पर उनकी स्त्रियाँ विलाप करने लगीं ॥ ७८ ॥