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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

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राम को पैदल देखकर इन्द्र ने अपना रथ भेजा । इन्द्र के सारथि मातलि का हाथ पकड़कर रामजी उस रथ पर चढ़ गये । राम और रावण का परस्पर भयङ्कर युद्ध हुआ । अन्त में राम ने रावण को मारने के लिए धनुष पर वह ब्रह्मास्त्र चढ़ाया जो कभी व्यर्थ नहीं होता । उस ब्रह्मास्त्र से राम ने रावण के दशों शिरों को काटकर पृथ्वि पर गिरा दिया । राम ने धनुष की डोरी उतार दी और मातलि रथ लेकर स्वर्ग में चला गया । राम ने रावण की राज्यश्री विभीषण को सौंप दी और सीता को अग्नि में शुद्ध कर हनुमान्, सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण आदि को पुष्पक विमान पर चढ़ाकर अयोध्या की ओर लौट पड़े ।

त्रयोदश सर्ग

राक्षसराज रावण के बध के बाद मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम ने अग्नि-परीक्षा में विशुद्ध सीताजी को स्वीकार कर तथा लङ्का के राज्य पर रावण के भाई विभीषण को अभिषिक्त कर प्रिय पत्नी सीता, भ्राता लक्ष्मण, कपीश्वर सुग्रीव, भक्त हनुमान् जी, विचक्षण विभीषण तथा वानर एवं भालुओं के साथ पुष्पक विमान पर आरूढ होकर अयोध्या के लिए प्रस्थान करते समय मार्ग में सीता जी को तत्तत् स्थानों को दिखाते हुए उनका मनोरम वर्णन किया था । श्रीराम ने पहले अपने पूर्वजों से संबंधित फेनिल समुद्र, उसकी तटभूमि, वायु एवं मेघमार्ग का आकर्षक वर्णन करने के बाद उस दण्डकारण्य को दिखाया, जहाँ राक्षसों के भय से वल्कलधारी तपस्वियों ने पहले निवास करना छोड़ दिया था, फिर उस स्थान को बताया जहाँ रावण द्वारा हरण के समय उनके पैर से गिरा हुआ एक नूपुर प्राप्त हुआ था और लताओं ने अपने पल्लवों को हिलाकर, मृगियों ने दक्षिण की तरफ मुँह कर सीताजी के जाने का संकेत किया था । बाद माल्यवान् पर्वत तथा उस पम्पासर का सुन्दर वर्णन किया है, जिसके जल की मनोहरता के कारण उनकी दृष्टि उसे छोड़ना नहीं चाहती थी । अनन्तर सारस पक्षियों से पूर्ण गोदावरी नदी, पञ्चवटी, स्वर्ग से राजा नहुष को च्युत करने वाले अगस्त्य जी का आश्रम, शातकर्णि मुनि का पञ्चाप्सर नामक सरोवर, सुतीक्ष्ण मुनि, शरभङ्ग मुनि के आश्रम, गगनचुम्बी विचित्र चित्रकूट, निर्मल मन्दाकिनी नदी, अत्रि मुनि के शान्त तपःस्थान एवं अनसूया जी द्वारा लाई गयी गङ्गाजी का वर्णन है । तीर्थराज प्रयाग में गङ्गा-यमुना के सङ्गम का मनोहर एवं साहि-