रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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Read in context३९४ रघुवंशमहाकाव्ये
ङ्हूतो गुणोत्कर्षे' इति केशवः । तया लक्ष्म्या करणेन निमन्त्रयाञ्चक्रे आहूतवान् । राज्यमनुभवैत्याजुहावेत्यर्थः ।
भाषार्थ—चित्रकूटके वन में निवास करते हुए राम के पास जाकर भरत ने उन्हें दशरथ जी की मृत्यु का समाचार सुनाया और कहा कि अयोध्या का राज्य लक्ष्मी को मैंने छुआ भी नहीं है उसे मैं स्वीकार नहीं करूँगा । आप चलकर उसे संभालिये ॥ १५ ॥
स हि प्रथमजे तस्मिन्नकृतश्रीपरिग्रहे ।
परिवेत्तारमात्मानं मेने स्वीकरणाद्भुवः ॥ १६ ॥
अन्वयः—स हि प्रथमजे अकृतश्रीपरिग्रहे ( सति ) भुवः स्वीकरणात् आत्मानं परिवेत्तारं मेने ।
स हीति । स हि भरतः प्रथमजेऽग्रजे तस्मिन्दरामेऽकृतश्रीपरिग्रहे सति स्वयं-भुवः स्वीकरणादात्मानं परिवेत्तारं मेने । 'परिवेत्ताऽनुजोऽनूढे ज्येष्ठे दारपरिग्रहात्' इत्यमरः । भूपरिग्रहोऽपि दारपीरग्रहसम इति भावः ।
भाषार्थ—धर्मशास्त्रों में बड़े भाई के अविवाहित रहते विवाह करनेवाले छोटे भाई को परिवेत्ता कहा गया है और इस प्रकार का विवाह निन्दित माना गया है। शास्त्रों में स्त्री परिग्रह के समान ही राजलक्ष्मी का परिग्रह भी माना गया है। भरतजी ने अपने बड़े भाई राम की राज्यलक्ष्मी स्वीकार न करने पर पहले स्वयं राज्यलक्ष्मी को स्वीकार करने वाले अपने को परिवेत्ता संज्ञक दोषी माना ॥ १६ ॥
तमशक्यमपाक्रष्टुं निदेशात्स्वर्गिणः पितुः ।
ययाचे पादुके पश्चात्कर्तुं राज्याधिदेवते ॥ १७ ॥
अन्वयः—स्वर्गिणः पितुः निदेशात् अपाक्रष्टुं अशक्यं तं पश्चात् राज्याधिदेवते कर्तुं पादुके ययाचे ।
तमिति । स्वर्गिणः स्वर्गंतस्य पितुर्निदेशाच्छासनादपाक्रष्टुं निवर्तयितुमशक्यं तं रामं पश्चाद्राज्याधिदेवते स्वामिन्यौ कर्तुं पादुके ययाचे ।
भाषार्थ—रामजी अपने स्वर्गीय पिता की आज्ञा से टस से मस नहीं हुए। तब भरतजी ने उनसे प्रार्थना की कि आप अपनी चरण पादुका मुझे दे दीजिए जिन्हें मैं आपके स्थान पर रखकर राज्य का काम चलाऊँ ॥ १७ ॥
स विसृष्टस्तथेत्युक्त्वा भ्रात्रा नैव विशत्पुरीम् ।
नन्दिग्रामगतस्तस्य राज्यं न्यासमिवाभुनक् ॥ १८ ॥