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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 435 of 735

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Page 435

३७६ रघुवंशमहाकाव्ये

ऽनुयोगः पृच्छा च' इत्यमरः। स गुरुः स्वान्तं शुभोदर्कं भावीति तस्य राज्ञो व्यथामलघयल्लघूकृतवान्।

भाषार्थ—उस प्रतिकूल हवा आदि से अपशकुन होते देखकर कार्यज्ञ राजा दशरथजी ने उसकी शान्ति के लिए अपने गुरु वसिष्ठजी से पूछा, उसपर उन्होंने कहा कि चिन्ता की कोई बात नहीं, इसका फल अच्छा होगा, यह सुनकर दशरथजी का कष्ट कुछ हलका हुआ ॥ ६२ ॥

तेजसः सपदि राशिरुत्थितः प्रादुरास किल वाहिनीमुखे।
यः प्रमृज्य नयनानि सैनिकैर्लक्षणीयपुरुषाकृतिश्चिरात् ॥ ६३ ॥

अन्वयः—सपदि उत्थितः तेजसः राशिः वाहिनीमुखे प्रादुरास किल यः सैनिकैः नयनानि प्रमृज्य चिरात् लक्षणीयपुरुषाकृतिः।

तेजस इति। सपद्युत्थितस्तेजसो राशिर्वाहिनीमुखे सेनाग्रे प्रादुरास किल खलु। यः सैनिकैर्नयनानि प्रमृज्य चिराल्लक्षणीया भावनीया पुरुषाकृतिर्यस्य स तथोक्तः। अभूदिति शेषः।

भाषार्थ—तत्काल सेना के सामने एक ऐसा प्रकाशमान पुञ्ज दिखाई पड़ा जिससे सैनिकों की आंखे चौंधिया गईं, जब उन्होंने आँखें मलकर देखा तब वह प्रकाशपुञ्ज एक पुरुष के रूप में दिखाई दिया ॥ ६३ ॥

पित्र्यमंशमुपवीतलक्षणं मातृकं धनुरूर्जितं दधत्।
यः ससोम इव घर्मदीधितिः सद्विजिह्व इव चन्दनद्रुमः ॥ ६४ ॥

अन्वयः—उपवीतलक्षणं पित्र्यं अंशं धनुरूर्जितं मातृकं अंशं च दधत् यः ससोम घर्मदीधितिः इव सद्विजिह्वः चन्दनद्रुमं इव स्थितः।

पित्र्यमिति। उपवीतं लक्षणं चिह्नं यस्य तम्। पितुरयं पित्र्यः। "वाय्वृतु-पितृषसो यत्" 'पितुर्यञ्च' इति यत्प्रत्ययः। तमंशं धनुषोर्जितं धनुरूर्जितं मातुरयं मातृकः। 'ऋतष्ठञ्" इति ठञ्प्रत्ययः। तमंशं च दधद्यो भार्गवः ससोमश्चन्द्रयुक्तो घर्मदीधितिः सूर्य इव सद्विजिह्वः ससर्पश्चन्दनद्रुम इव स्थितः।

भाषार्थ—उस तेजस्वी पुरुष के शरीर पर ब्राह्मण पिता के अंश का सूचक यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था और कन्धे पर क्षत्रिय माता का अंश सूचित करने वाला धनुष लटक रहा था। इस वेश में वे ऐसे जान पड़ते थे मानो सूर्य के साथ चन्द्रमा हो अथवा चन्दन के वृक्ष में सांप लिपटे हों ॥ ६४ ॥

येन रोषपरुषात्मनः पितुः शासने स्थितिविदोऽपि तस्थुषा।
वेपमानजननीशिरश्छिदा प्रागजीयत घृणा ततो मही ॥ ६५ ॥