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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

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ने इनकी सहायता के लिए सेना नहीं भेजी, ऋषि का आशीर्वाद ही पर्याप्त था। आज तक दोनों बालकों ने घर से बाहर पैर रखा ही न था इसलिए मार्ग में ही विश्वामित्रजी ने उन्हें बला और अतिबला विद्याएँ सिखा दी जिनके प्रभाव से उनको न तो थकान लगी, न भूख-प्यास ही। कमलों से सुशोभित सरोवरों तथा वृक्षों की छाया में भी आश्रमवासी उतने प्रसन्न नहीं थे जितना इन दोनों राजकुमारों को देखकर प्रसन्न हुए।

मार्ग में उन्हें सुकेतु की कन्या ताड़का राक्षसी मिली, जिसने समस्त आश्रम को उजाड़ बना दिया था। जिसकी कथा विश्वामित्रजी ने पहले ही बता दी थी। उसे देखते ही दोनों भाइयों ने धनुष को पृथ्वी पर टेककर डोरियाँ चढ़ा लीं। उसकी ध्वनि सुनते ही अमावस्या की रात्रि के समान काली-कलूटी ताड़का उनके आगे आकर खड़ी हो गयी और बड़े वेग से गरजती हुई राम पर टूट पड़ी। यह देखकर राम ने स्त्री-वध की घृणा और बाण दोनों एक साथ छोड़े। राम के बाण से ताड़का की छाती फट गयी और वह जमीन पर गिर गयी। साथ ही रावण की राजलक्ष्मी भी कांप उठी। ताड़का के मरने से प्रसन्न होकर विश्वामित्रजी ने राक्षसों का संहार करने वाला दिव्य अस्त्र भी मन्त्र सहित दे दिया। उसके बाद ऋषि के आश्रम पर पहुँचकर उन्होंने बड़े-बड़े राक्षसों को मारा। दिव्य अस्त्र चलाने में राम का हाथ इतना सधा हुआ था कि उन्होंने झट अपने धनुष पर वायव्य अस्त्र चढ़ाया और ताड़का के पुत्र मारीच को दूर फेंक दिया तथा सुबाहु को भी मार गिराया। यह अद्भुत पराक्रम देखकर ऋषियों ने राम की बड़ी प्रशंसा की और विश्वामित्रजी ने विधि के साथ यज्ञ समाप्त कर राम और लक्ष्मण को बड़ा ही शुभाशीर्वाद दिया और उसके शिर पर अपनी हथेली रखकर अपना बड़ा स्नेह दिखाया।

उन्हीं दिनों मिथिलानरेश राजा जनक ने धनुषयज्ञ ठान रखा था जिसमें उन्होंने मुनियों को भी निमन्त्रित किया था। धनुषयज्ञ की बात सुनकर राम-लक्ष्मण दोनों को बड़ा कुतूहल हुआ, अतः विश्वामित्र उन दोनों राजकुमारों को साथ लेकर मिथिलापुरी की ओर चल दिये। कुछ दूर जाने के बाद शाम हो गयी और वे उस आश्रम के वृक्षों के नीचे टिक गये जहाँ गौतम मुनि की पत्नी अहल्या पति के श्राप से पत्थर बन गयी थी। राम की चरण-धूलि के स्पर्श से वह सुन्दर स्त्री बन गयी। राजा जनक ने ऋषि का आगमन सुनकर राजकुमारों के साथ उनका बड़ा सत्कार किया। जनकपुर निवासी राज-