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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 428 of 735

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Page 428

एकादशः सर्गः ३६९

पुष्पचापमिव नातियत्नतो नातियत्नात् । नञर्थस्य नशब्दस्य सुप्सुपेति समासः । आततज्यमधिज्यम् । अकरोत् ।

भाषार्थ— सभा में स्थित समस्त सभासदों के द्वारा आश्चर्यपूर्वक निर्निमेष दृष्टि से देखे जाते हुए राम ने पर्वत के समान भारी उस धनुष पर वैसी ही सरलता से डोरी चढ़ा दी जैसे कामदेव अपने पुष्पों के कोमल धनुष पर अनायास डोरी चढ़ा देता है ॥ ४५ ॥

भज्यमानमतिमात्रकर्षणात्तेन वज्रपरुषस्वनं धनुः।
भार्गवाय दृढमन्यवे पुनः क्षत्रमुद्यतमिव न्यवेदयत् ॥ ४६ ॥

अन्वयः— तेन अतिमात्रकर्षणात् भज्यमानं ( अत एव ) वज्रपरुषस्वनं धनुः दृढमन्यवे भार्गवाय क्षत्रं पुनः उद्यतं न्यवेदयत् ।

भज्यमानमिति । तेन रामेणातिमात्रकर्षणाद्भूज्यमानमत एव वज्रपरुषस्वनं वज्रमिव परुषः स्वनो यस्य तत् धनुः कर्तृ दृढमन्यवे दृढक्रोधाय । 'मन्युः क्रोधे क्रतौ दैन्ये' इति विश्वः । भार्गवाय क्षत्रं क्षत्रकुलं पुनरुद्यतमिति न्यवेदयदिव ज्ञापयामासेव ।

भाषार्थ— राम ने उस धनुष को इतना तान दिया कि वह वज्र के समान भयंकर शब्द करते हुए कड़कड़ाकर टूट गया, मानों उसने महाक्रोधी परशुराम को सूचना दे दी कि क्षत्रियों ने अब पुनः शिर उठाना आरम्भ कर दिया है ॥ ४६ ॥

दृष्टसारमथ रुद्रकार्मुके वीर्यशुल्कमभिनन्द्य मैथिलः।
राघवाय तनयामयोनिजां रूपिणीं श्रियमिव न्यवेदयत् ॥ ४७ ॥

अन्वयः— अथ मैथिलः रुद्रकार्मुके दृष्टसारं वीर्यशुल्कं अभिनन्द्य राघवाय अयोनिजां तनयां रूपिणीं श्रियं इव न्यवेदयत् ।

दृष्टेति । अथ मैथिलो जनको रुद्रकार्मुके शङ्करधनुषि दृष्टः सारः स्थिरांशो यस्य तद्दृष्टसारं विलोकितविक्रमम् । 'सारो बले स्थिरांशे च' इति विश्वः । वीर्यमेव शुल्कं धनुर्भङ्गरूपमित्यर्थः । अभिनन्द्य राघवाय रामायायोनिजां देवयजनसम्भवां तनयां सीतां रूपिणीं श्रियमिव साक्षाल्लक्ष्मीमिव न्यवेदयदर्पितवान् । वाचेति शेषः ।

भाषार्थ— इसके बाद जब मिथिला नरेश जनक जी ने देखा कि राम ने शिव-धनुष को तोड़कर अपना पराक्रम दिखला दिया, तब उन्होंने धनुर्भंग रूप पराक्रम मूल्य का अभिनन्दन करके पृथ्वी से उत्पन्न अपनी पुत्री सीताजी को इस प्रकार राम को सौंप दिया मानों साक्षात् अपनी लक्ष्मी उन्हें दे डाली हो ॥ ४७ ॥

२४ र० सम्प्र०