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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 419 of 735

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Page 419

३६० रघुवंशमहाकाव्ये

नस्य स्वपूर्वावतारविशेषस्याश्रमपदमूपेयिवानुपगतः सन्। "उपेयिवाननाश्वाननूचा-
नश्च" इति निपातः। प्रथमजन्मचेष्टितानि रामवामनयोरैक्यात्स्मृतियोग्यान्यपि
रामस्याज्ञानावतारत्वेन संस्कारदौर्बल्यादस्मरन्नपि उन्मना उत्सुको बभूव।

**भाषार्थ—**वहां से रामजी वामन के पवित्र आश्रम में गये, जिसके विषय में विश्वामित्रजी ने उन्हें पहले ही सब बता दिया था। वहां अपने पूर्व जन्म (वामनावतार) की लीलाओं का ठीक-ठीक स्मरण न होने पर वे कुछ उत्कण्ठित से हो गये ॥ २२ ॥

आससाद मुनिरात्मनस्ततः शिष्यवर्गपरिकल्पितार्हणम् ।
बद्धपल्लवपुटाञ्जलिद्रुमं दर्शनोन्मुखमृगं तपोवनम् ॥ २३ ॥

**अन्वयः—**ततः मुनिः शिष्यवर्गपरिकल्पितार्हणं बद्धपल्लवपुटाञ्जलिद्रुमं दर्शनोन्मुखमृगं तपोवनं आससाद ।

आससादेति। ततो मुनिः शिष्यवर्गेण परिकल्पिता सज्जिताऽर्हणा पूजासामग्री यस्मिंस्तत्तथोक्तम्। 'सपर्याचार्हणाः समाः इत्यमरः। बद्धा पल्लवपुटा एवाञ्जलयो यैस्ते तथाभूता द्रुमा यस्मिंस्तत्तथोक्तं दर्शनेन मुनिदर्शनेनोन्मुखा मृगा यस्मिंस्तत्तत् आत्मनस्तपोवनमाससाद। एतेन विशेषणत्रयेणातिथिसत्कारतच्छील्यविनय-शान्तयः सूचिताः।

**भाषार्थ—**वहां से विश्वामित्रजी अपने उस आश्रम पर पहुँच गये, जहाँ शिष्यों ने पूजा की सब सामग्री इकट्ठी कर रखी थी, वृक्ष अपने पत्तों की अञ्जलि बाँधे खड़े और मृग बड़ी उत्सुकता से इन लोगों को देख रहे थे ॥ २३ ॥

तत्र दीक्षितमृषिं ररक्षतुर्विघ्नतो दशरथात्मजौ शरैः ।
लोकमन्धतमसात्क्रमोदितौ रश्मिभिः शशिदिवाकराविव ॥ २४ ॥

**अन्वयः—**तस्य दशरथात्मजौ दीक्षित ऋषिं शरैः विघ्नतः क्रमोदितौ शशिदिवाकरौ रश्मिभिः अन्धतमसात् लोकम् इव ररक्षतुः ।

तत्रेति। तत्र तपोवने आश्रमे दशरथात्मजौ दीक्षितं दीक्षासंस्कृतमृषिं शरैर्विघ्नतो विघ्नेभ्यः क्रमेण पर्यायेण रात्रिदिवसयोरुदितौ शशिदिवाकरौ रश्मिभिः किरणैरन्धतमसाद्गाढध्वान्तात् । 'ध्वान्ते गाढेऽन्धतमसम्' इत्यमरः। अवसमन्धे-ष्यस्तमसः" इति समासान्तोऽच्प्रत्ययः। लोकमिव ररक्षतुः। रक्षणप्रवृत्तावभूतामित्यर्थः।

**भाषार्थ—**जिस प्रकार उदय को प्राप्त हुए सूर्य और चन्द्रमा बारी-बारी से अपनी किरणों से पृथ्वी का अन्धकार दूर करते हैं, उसी प्रकार आश्रम में राजा दशरथ के दोनों पुत्र राम और लक्ष्मण ने यज्ञ करने के लिए दीक्षित विश्वामित्रजी की बाणों द्वारा विघ्नों से रक्षा की ॥ २४ ॥