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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 409 of 735

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Page 409
३५०रघुवंशमहाकाव्ये

पणबन्धेन फलसिद्धया व्यक्तयोगैरनुमितप्रयोगैरुपायैश्चतुर्भिः सामादिभिर्नयो नीतिरिव। युगपद्दीर्घैश्चतुर्भिर्दोर्भिर्भुजैर्हरिर्विष्णुरिव। 'यानाद्यङ्गे युगः पुंसि' इत्यमरः। तदीयैर्हरिसम्बन्धिभिरंशैरंशभूतैश्चतुर्भिस्तैः पुत्रैरवनिपतीनां पती राजराजो दशरथश्चकाशे विदियुते।

इति महामहोपाध्यायकोलाचलमल्लिनाथसूरिविरचितया संजीविनीसमाख्यया व्याख्यया समेतो महाकविश्रीकालिदासकृतो रघुवंशे महाकाव्ये रामावतारो नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥

**भाषार्थ—**जिस प्रकार असुरों की तलवार की धार को कुण्ठित करनेवाले अपने चार दांतों से ऐरावत शोभा देता है, उसी प्रकार साम, दाम, दण्ड और भेद इन चार उपायों से राजनीति शोभा देती है और जिस प्रकार रथ के जुवे के समान लम्बी-लम्बी भुजाओं से विष्णु भगवान् शोभा देते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ भी अपने चार सुयोग्य पुत्रों से सुशोभित हुए ॥ ८६ ॥

यह त्रिपाठ्युपाह्व पं० श्रीकृष्णमणिशास्त्री द्वारा लिखित
अन्वय ओर 'चन्द्रकला' नाम की हिन्दी टीका में
रघुवंशमहाकाव्य का रामावतार नामक
दशम सर्ग समाप्त हुआ ॥ १० ॥


एकादशः सर्गः

रामचन्द्रचरणारविन्दयोरन्तरङ्गचरभृङ्गलील या।
तत्र सन्ति हि रसाश्चतुर्विधास्तान्यथारुचि सदैव निर्विश ॥

कौशिकेन स किल क्षितीश्वरो राममध्वरविघातशान्तये।
काकपक्षधरमेत्य याचितस्तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते ॥ १ ॥

**अन्वयः—**कौशिकेन एत्य सः क्षितीश्वरः अध्वरविघातशान्तये काकपक्षधरं रामं याचितः किल हि तेजस्विनां वयः न समीक्ष्यते।

कौशिकेनेति। कौशिकेन कुशिकापत्येन विश्वामित्रेणैत्याभ्यागत्य स क्षितीश्वरो दशरथः अध्वरविघातशान्तये यज्ञविघ्नविध्वंसाय काकपक्षधरं बालकोचितशिखाधरम्। 'बालानां तु शिखा प्रोक्ता काकपक्षकः शिखण्डकः' इति हलायुधः। रामं