Skip to content
SarvaKosh
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 382 of 735

Read in context
Page 382

दशमः सर्गः । ३२३

सृष्टिस्थितिसंहारकर्तृत्वेन स्थित आत्मा स्वरूपं यस्य तस्मै ब्रह्मविष्णुहरात्मने तुभ्यं नमः।

भाषार्थ—पहले संसार की सृष्टि करने वाले, उसके बाद विश्व का पालन करने वाले और अन्त में उनका संहार करने वाले, इस प्रकार तीन रूपों में स्थित आपको प्रणाम है ॥ १६ ॥

ननु कूटस्थस्य कथं त्रैरूप्यमित्याशङ्क्योपाधिकमित्याह—

रसान्तराण्येकरसं यथा दिव्यं पयोऽश्नुते ।
देशे देशे गुणेष्वेवमवस्थास्त्वमविक्रियः ॥ १७ ॥

अन्वयः—यथा एकरसं दिव्यं पयः देशे देशे रसान्तराणि अश्नुते एवम् अविक्रियः त्वं गुणेषु अवस्थाः ( अश्नुषे )।

रसान्तराणीति । एकरसं मधुरैकरसं दिवि भवं दिव्यं पयो वर्षोदकं देशे देशे ऊषरादिदेशेऽन्यान्रसान्रसान्तराणि लवणादीनि यथाश्नुते प्राप्नोति एवमविक्रयी निर्विकारः एकरूप इत्यर्थः। त्वं गुणेषु सत्त्वादिष्ववस्थाः स्रष्टृत्वादिरूपा अश्नुते।

भाषार्थ—जिस प्रकार एक रस वर्षा का जल भिन्न-भिन्न स्थानों में गिरकर अनेक रसवाला हो जाता है उसी प्रकार सब प्रकार के विकारों से दूर होते हुए भी आप सत्त्व, रज एवं तम इन तीनों गुणों के सम्बन्ध से अनेक रूप धारण कर लेते हैं ॥ १७ ॥

अमेयो मितलोकस्त्वमनर्थी प्रार्थनावहः ।
अजितो जिष्णुरत्यन्तमव्यक्तो व्यक्तकारणम् ॥ १८ ॥

अन्वयः—( हे देव ? ) त्वम् अमेयः ( सन् ) मितलोकः, अनर्थी ( सन् ) प्रार्थनावहः, अजितः ( सन् ) जिष्णुः, अत्यन्तम् अव्यक्तः ( सन् ) व्यक्तकारणम् ( असि )।

अमेय इति । हे देव ! त्वममेयो लोकैरियतया न परिच्छेद्यः मितलोकः परिच्छिन्नलोकः अनर्थी निस्पृहः। आवहतीत्यावहः। पचाद्यच्। प्रार्थनानामावहः कामदः अजितोऽन्यैर्न जितः जिष्णुर्जयशीलः अत्यन्तमव्यक्तोऽतिसूक्ष्मरूपः व्यक्तस्य स्थूलरूपस्य कारणम्।

भाषार्थ—हे विष्णो ! आप अपरिमेय होते हुए भी संसार को मापने वाले हैं, आप स्वयं निस्पृह होते हुए भी दूसरों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, आपको कोई नहीं जीत सकता, पर आपने सबको जीत लिया है और आप स्वयं सूक्ष्म होने पर भी स्थूल रूप के कारण हैं ॥ १८ ॥