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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 351 of 735

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Page 351
२९२रघुवंशमहाकाव्ये

राग द्वेष और काम को जीतनेवाले योगियों का मन भी मचल उठा। अर्थात् जिस प्रकार नर्तकी नाच के द्वारा सभासदों का मनोरंजन करती है उसी प्रकार हिलती हुई आम्रलता ने भी योगियों के मन को मुग्ध कर दिया ॥ ३३ ॥

प्रथममन्यभृताभिरुदीरिताः प्रविरला इव मुग्धवधूकथाः ।
सुरभिगन्धिषु शुश्रुविरे गिरः कुसुमितासु मिता वनराजिषु ॥ ३४ ॥

अन्वयः— सुरभिगन्धिषु कुसुमितासु वनराजिषु अन्यभृताभिः प्रथमम् उदीरिताः मिताः गिरः प्रविरलाः मुग्धवधूकथा इव शुश्रुविरे ।

प्रथममिति । सुरभिर्गन्धो यासां तासु सुरभिगन्धिषु । 'गन्धस्येदूत्पूतिसुसुरभिभ्यः' इत्यदिनेकारः । कुसुमान्यासां संजातानि कुसुमिताः । तासु वनराजिषु वनपङ्क्तिषु अन्यभृताभिः कोकिलाभिः प्रथमं प्रारम्भेषूदीरिता उक्ता अत एव मिताः परिमिता गिर आलापः प्रविरला मौग्ध्यात्स्तोकोक्तां मुग्धवधूनां कथा वाच इव शुश्रुविरे श्रुताः

भाषार्थ— मनोहर गन्धवाली प्रफुल्लित वनराजियों से बैठकर कुहकने वाली कोयलों की परिमित वाणी ऐसी मालूम पड़ती थी मानों मुग्ध स्त्रियों के मधुर आलाप हों । अर्थात्—जिस प्रकार रतिकाल में नववधूंए लज्जा से कम बोलती हैं उसी प्रकार गन्धयुक्त पुष्पित उपवन में कोयलों का कुहकना कहीं २ सुनाई पड़ने लगा ॥ ३४ ॥

श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः कुसुमकोमलदन्तरुचो बभुः ।
उपवनान्तलताः पवनाहतैः किसलयैः सलयैरिव पाणिभिः ॥ ३५ ॥

अन्वयः— श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः कुसुमकोमलदन्तरुचः उपवनान्तलताः पवनाहतैः किसलयैः सलयैः पाणिभिः इव वभुः।

श्रुतीति । श्रुतिसुखाः कर्णमधुरा भ्रमरस्वना एव गीतयो यासां ताः । कुसुमान्येव कोमला दन्तरुचो दन्तकान्तयो यासां ताः । अनेक सस्मितत्वं विवक्षितम् । उपवनान्तलताः आराममध्यवल्ल्यः पवनेनाहतैः कम्पितैः किसलयैः सलयैः साभिनयैः लयशब्देन-लयानुगतोऽभिनयो लक्ष्यते । उपवनान्ते पवनाहतैरिति सक्रियत्वाभिधानात् । पाणिभिरिव बभुः । अनेन लतानां नर्तकीसाम्यं गम्यते ।

भाषार्थ— उपवन में बढ़ी हुई लतायें नर्तकी के समान ऐसी सजीव जान पड़ती थीं मानों कानों को सुख देनेवाले भ्रमरों की गुंजार ही उनकी गीत हो, खिले हुए कोमल फूल ही उनके हंसी के दांत हों और वायु से हिलाई गई शाखाओं वाले हाथों से अनेक प्रकार के हाव-भाव दिखा रही हों ॥ ३५ ॥