रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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गुरुदक्षिणा से अधिक लेना अस्वीकार कर दिया। राजा सब धन देना चाहते थे और वे अधिक लेना नहीं चाहते थे, यह दृश्य देखकर अयोध्यावासी दोनों को धन्य धन्य कहने लगे।
कौत्स ने प्रसन्न होकर राजा से कहा—धर्मरक्षक राजा को यदि पृथ्वी धन्य-धान्य दे तो क्या आश्चर्य है, आप तो स्वर्ग से भी अभीष्ट धन ले लेते हैं यही आश्चर्य है। आपके यहाँ पुत्र के अतिरिक्त किसी वस्तु की कमी नहीं है। अतः आप योग्य पुत्र को प्राप्त करें, यही मैं आशीर्वाद देता हूँ। यह आशीर्वाद देकर कौत्स चले गये और राजा ने ऊँट, घोड़ों से गुरुदक्षिणा आश्रम पर भेज दी।
बाद में राजा रघु को पुत्रलाभ हुआ उन्होंने उसका नाम अज रखा। रघु के समान ही अज का भी रङ्ग-रूप, शरीर आदि सुन्दर और आकर्षक था। गुरुओं से विद्या प्राप्त करते हुए अज युवराज के योग्य हो गये। विदर्भ देश के राजा भोज ने अपनी बहन इन्दुमती के स्वयंवर में अज को बुलाने के लिए रघु के पास निमन्त्रण भेजा। राजा रघु ने अज को विवाह के योग्य और भोज के सम्बन्ध का औचित्य समझकर सेना सहित अज को विदर्भ भेज दिया। रास्ते में नर्मदा नदी के किनारे अज की सेना का पड़ाव पड़ा। नर्मदा से एक मत्त हाथी पानी उछालता हुआ निकला। सेना के हाथी उस जंगली हाथी के मद की उत्कट गन्ध को सूँघकर भागने लगे, घोड़े दौड़ने लगे, रथ टूटकर गिर गये एवं स्त्रियों की रक्षा के लिए सैनिक दौड़ पड़े, इस तरह उस हाथी ने सबको व्याकुल कर दिया।
तब अज ने बाण से गज के मस्तक पर मारा, बाण लगते ही वह हाथी से एक दिव्य पुरुष बन गया और अज के ऊपर नन्दन वन के पुष्पों की वर्षा करते हुए बोला—कुमार ! मैं गन्धर्वराज प्रियदर्शन का पुत्र प्रियंवद हूँ, मतङ्ग मुनि के शाप से हाथी हो गया था। महात्माओं का स्वभाव जल की तरह शीतल.होता है, प्रार्थना करने पर उन्होंने कहा—अज के बाण की चोट लगते ही मेरे शाप का अन्त हो जायेगा। आपने शाप से मुझे मुक्त कर दिया। यदि मैं आपका कोई उपकार न करूँ तो मेरी दैवी सम्पत्ति व्यर्थ है। मित्र ! मैं संमोहन नामक अस्त्र देता हूँ, इससे शत्रु मूर्च्छित हो जाते हैं और बिना हिंसा के विजय मिल जाती है। आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें। तदनुसार अज ने नर्मदा के जल से आचमन करके शुद्ध हो उस गन्धर्व से संमोहन अस्त्र सीख लिया। इस प्रकार मार्ग में दैवात् दिव्य अस्त्र पाकर अज विदर्भ को गये और