Skip to content
SarvaKosh
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished735 pages

Page 283 of 735

Read in context
Page 283

२२४ रघुवंशमहाकाव्ये

से बीच में ही कट जाते थे फिर भी इतना वेग होता था कि उनका फल लगा
हुआ अगला भाग लक्ष्य तक पहुँच ही जाता था ॥ ४५ ॥

आधोरणानां गजसन्निपाते शिरांसि चक्रैर्निशितैः क्षुराग्रैः ।
हृतान्यपि श्येननखाग्रकोटिव्यासक्तकेशानि चिरेण पेतुः ॥ ४६ ॥

अन्वयः—गजसन्निपाते निशितैः क्षुराग्रैः चक्रैः हृतानि अपि श्येननखाग्र-
कोटिव्यासक्तकेशानि आधोरणानां शिरांसि चिरेण पेतुः ।

आधोरणानामिति । गजसंनिपाते गजयुद्धे निशितैस्त एव क्षुराग्रैः क्षुरस्या-
ग्रमिवाग्रं येषां तश्चक्रैरायुधविशेषैर्हृतानि छिन्नान्यपि श्येनानां पक्षिविशेषाणाम् ।
'पक्षी श्येनः' इत्यमरः । नखाग्रकोटिषु व्यासक्ताः केशा येषां तानि आधोरणानां
हस्त्यारोहाणाम् । 'आधोरणा हस्तिपका हस्त्यारोहा निषादिन' इत्यमरः ।
शिरांसि चिरेण पेतुः पतितानि । शिरः पातात्प्रागेवारुह्य पश्चादुत्पततां पक्षिणां
नखेषु केशसङ्गश्चिरपातहेतुरिति भावः ।

भाषार्थ—हाथियों के युद्ध में तेज तथा क्षुरे के समान फलवाले चक्रों से
कटे हुए महावतों के मस्तकों को लेकर बाज पक्षी ऊपर उड़ जाते थे । लम्बे
लम्बे बाल बाजों के नखों में बंध जाते थे जिससे वे मस्तक कुछ देर में पृथ्वी
पर गिरते थे । ४६ ॥

पूर्वं प्रहर्ता न जघान भूयः प्रतिप्रहाराक्षममश्वसादी ।
तुरङ्गमस्कन्धनिषण्णदेहं प्रत्याश्वसन्तं रिपुमाचकांक्ष ॥ ४७ ॥

अन्वयः—पूर्वं प्रहर्ता अश्वसादी प्रतिप्रहारक्षमं तुरङ्गमस्कन्धनिषण्णदेहम्
रिपुं भूयः न जघान किन्तु प्रत्याश्वसन्तम् आचकांक्ष ।

पूर्वमिति । पूर्वं प्रथमं प्रहर्त्ताश्वसादी तोरङ्गिकः प्रतिहारेऽक्षममशक्तं तुरङ्गम-
स्कन्धे निषण्णदेहम् मूर्छितमित्यर्थः । रिपुं भूयो न जघान पुनर्न प्रजहार किन्तु
प्रत्याश्वसन्तं पुनरुज्जीवन्तमाचकाङ्क्ष । 'नायुधव्यसनं प्राप्तं नातं नातिपरिक्षतम्'
इति निषेधादिति भावः ।

भाषार्थ—एक घुड़सवार ने अपने शत्रु घुड़सवार पर प्रहार किया जिससे
वह घोड़े के कन्धे पर झूल गया उसे अपना शिर उठाने की भी शक्ति नहीं
रही । पहले प्रहार करने वाले घुड़सवार ने मूर्छित होने के कारण अपने ऊपर
अस्त्र चलाने में असमर्थ उस शत्रु पर फिर प्रहार नहीं किया किन्तु उसके जीने
की ही इच्छा की । क्योंकि ऐसे शत्रुओं पर प्रहार करना निन्दित माना गया है।