रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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Read in context१६२ | रघुवंशमहाकाव्ये
भाषार्थ—ठीक, इनके राजभवन के पास ही समुद्र वर्तमान है जिसकी लहरें राजभवन के झरोखों से स्पष्ट दिखाई देती हैं। जब ये अपने महल में सोते हैं तब अपनी गम्भीर गर्जना से रात्रि के चतुर्थ प्रहर के अन्त में बजनेवाले बाजों को व्यर्थ कर देने वाला वह समुद्र ही इन्हें प्रातः काल में जगाता है ॥ ५६ ॥
अनेन सार्धं विहराम्बुराशेस्तीरेषु तालीवनमर्मरेषु ।
द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुष्पैरपाकृतस्वेदलवा मरुद्भिः ॥ ५७ ॥
अन्वयः—अनेन सार्द्धं तालीवनमर्मरेषु अम्बुराशेः तीरेषु द्वीपान्तरानीत-लवङ्गपुष्पैः मरुद्भिः अपाकृतस्वेदलवा सती त्वं विहर ।
अनेनेति । अनेन राज्ञा सार्धं तालीवनैमर्मरेषु मर्मरेति ध्वनत्सु । ‘अथ मर्मरं स्वनिते वस्त्र-पर्णानाम्’ इत्यमरवचनाद्गुणपरस्यापि मर्मरशब्दस्य गुणिपरत्वं प्रयोगादवसेयम् । अम्बुराशेः समुद्रस्य तीरेषुद्वीपान्तरेभ्य आनीतानि लवङ्गपुष्पाणि देवकुसुमानि यैस्तैः । लवङ्गं देवकुसुमम् इत्यमरः । मरुद्भिर्वातैरपाकृताः प्रशमिताः स्वेदस्य लवा बिन्दवो यस्यः सा तथाभूता सती त्वं विहर क्रीड ।
भाषार्थ—यदि तुम चाहो तो इनके साथ विवाह करके समुद्र के उन तटों पर विहार करो, जहां पर रातों दिन ताड़ के वृक्षों की मर्मरध्वनि सुनाई पड़ती रहती है और विहार करनेवालों के पसीनों को अन्य द्वीपों से लवंग के पुष्पों की गन्ध को लेकर बहने वाली हवा दूर करती है ॥ ५७ ॥
प्रलोभिताप्याप्याकृतिलोभनीया विदर्भराजावरजा तथैवम् ।
तस्मादपावर्तत दूरकृष्टा नीत्येव लक्ष्मीः प्रतिकूलदैवात् ॥ ५८ ॥
अन्वयः—आकृतिलोभनीया विदर्भराजावरजा तथा एवं प्रलोभिता अपि नीत्या दूरकृष्टा लक्ष्मीः प्रतिकूलदैवात् जनात् इव तस्मात् अपावर्तत ।
प्रलोभितेति । आकृत्या रूपेण लोभनीयाऽकर्षणीया न तु वर्णनमात्रेणेत्यर्थः । विदर्भराजावरजा भोजानुजेन्दुमती तया सुनन्दयैवं प्रलोभितापि प्रचोदितापि नीत्या पुरुषकारेण दूरकृष्टा दूरमानीता लक्ष्मीः प्रतिकूलं दैवं तस्य तस्मात्पुंस इव तस्माद्धे-माङ्गदादपावर्तत प्रतिनिवृत्ता ।
भाषार्थ—केवल वर्णनमात्र से नहीं किन्तु सौन्दर्य से आकृष्ट होनेवाली विदर्भराज भोज की छोटी बहन वह इन्दुमती सुनन्दा की लुभावनी बातें सुनकर भी उस राजा को छोड़कर उसी प्रकार आगे बढ़ गई जिस प्रकार पुरुषार्थ से पाई गई लक्ष्मी भाग्यहीनपुरुष को छोड़कर चली जाती है ॥ ५८ ॥