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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

Page 244 of 735

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Page 244

षष्ठः सर्गः | १८५

दशास्येन यस्य कार्तवीर्यस्य कारागृहे बन्धनागारे। 'कारास्याद्बन्धनालये' इत्यमरः।
आप्रसादादनुग्रहपर्यन्तमुषितं स्थितम् । "नपुंसके भावे क्तः" एतत्प्रसाद एव तस्य
मोक्षोपायो न तु क्षात्रमिति भावः।

**भाषार्थ—**जिस रावण ने इन्द्र को जीत लिया था उसे भी उन्होंने अपने
कारागार में बन्दी बनाकर उसकी भुजाओं को धनुष की डोरी से इस प्रकार क-
सकर बांध दिया था कि वह बेचारा तब तक उसी में उसांस करता रहा जब
तक प्रसन्न होकर इन्होंने उसे नहीं छोड़ा ॥ ४० ॥

तस्यान्वये भूपतिरेष जातः प्रतीप इत्यागमवृद्धसेवी ।
येन श्रियाः संशयदोषरूढं स्वभावलोलेत्ययशः प्रमृष्टम् ॥ ४१ ॥

**अन्वयः—**आगमवृद्धसेवी प्रतीपः इति एष भूपतिः तस्य अन्वये जातः येन
संश्रयदोषरूढं श्रियः स्वभावलोला इति अयशः प्रमृष्टम् ।

तस्येति । आगमवृद्धसेवी श्रुतवृद्धसेवी प्रतीप इति ख्यात इति शेषः । एष
भूपतिस्तस्य कार्तवीर्यस्यान्वये वंशे जातः । येन प्रतीपेन संश्रयस्याश्रयस्य पुंसो
दोषैर्व्यसनादिभिः रूढमुत्पन्नं श्रियः संवन्धि स्वभावलोला प्रकृतिचञ्चलेत्येवंरूप-
मयशो दुष्कीर्तिः प्रमृष्टं निरस्तम् । दुष्टाश्रयत्यागशीलायाः श्रियः प्रकृतिचापलं-
प्रवादो मूढजनपरिकल्पित इत्यर्थः । अयं तु दोषराहित्यान्न कदाचिदपि श्रिया
त्यज्यत इति भावः ।

**भाषार्थ—**उन्हीं प्रसिद्ध राजा कीर्तवीर्य के वंश में ये उत्पन्न हुए हैं। ये वेदों
और वृद्धों की बड़ी सेवा करते हैं इनका नाम प्रतीप है। इन्होंने आश्रय दोष से
दूषित लक्ष्मी के स्वभावचञ्चला इस अपयश को धो दिया है। अर्थात् इनके पास
लक्ष्मी सदा निवास करती है। वास्तविक बात यह है कि लक्ष्मी तो उसी व्यक्ति
को छोड़कर अन्यत्र चली जाती है जो दुर्व्यसनी हो पर इनमें कोई व्यसन नहीं
तो इन्हें क्यों कर छोड़े ॥ ४१ ॥

आयोधने कृष्णगति सहायमवाप्य यः क्षत्रियकालरात्रिम् ।
धारां शितां रामपरश्वधस्य संभावयत्युत्पलपत्रधाराम् ॥ ४२ ॥

**अन्वयः—**यः आयोधने कृष्णगतिं सहायं अवाप्य क्षत्रियकालरात्रि रामपर-
श्वधस्य शितां धारां उत्पलपत्रधारां संभावयति ।

आयोधन इति । यः प्रतीप आयोधने युद्धे कृष्णगति कृष्णवर्त्मानमग्नि सहाय-
मवाप्य क्षत्रियाणां कालरात्रि संहाररात्रिमित्यर्थः। रामपरश्वधस्य जामदग्न्यपरशोः।
'द्वयोः कुठारः स्वधितिः परशुश्च परश्वधः' इत्यमरः । शितां तीक्ष्णां धारां मुखम् ।