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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

by महर्षि पराशर

Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)

DevanagariSanskritpublished170 pages

Page 48 of 170

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Page 48

३६ पाराशरस्मृतिः [ चतुर्थो-
विनिर्वर्त्य यदा शूद्रा उदकान्तमुपस्थिताः ।
द्विजैस्तदानुगन्तव्या एष धर्मः सनातनः ॥४९॥
जब शूद्र लोग दाह कर प्रेत को जलांजलि दे घर लौट आवें
तब ब्राह्मणादि वर्णों को उनके घर जाना चाहिए, यह सनातन
धर्म है ॥ ४९ ॥
तस्माद् द्विजो मृतं शूद्रं न स्पृशेन्न च दाहयेत् ।
दृष्टे सूर्यविलोकेन शुद्धिरेषा पुरातनी ॥५०॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे जनन-मरण-सूतकादिशुद्धिर्नाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इसलिए ब्राह्मण किसी मरे हुए शूद्र का न तो स्पर्श करें और
न उसे जलावें। यदि कदाचित् देख भी लें तो भगवान् सूर्य के दर्शन
कर लेने से शुद्ध हो जाते हैं। यही प्राचीन परिपाटी है ॥ ५० ॥
इस प्रकार 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में जनन-मरण-सूतकादि-
शुद्धि नामक तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
•
४. चतुर्थोऽध्यायः
अतिमानादतिक्रोधात् स्नेहाद् वा यदि वा भयात् ।
उद्वध्नीयात् स्त्री पुमान् वा गतिरेषा विधीयते ॥ १ ॥
यदि कोई स्त्री अथवा पुरुष अत्यन्त मान से, क्रोध से, स्नेह से
अथवा अत्यन्त भय से फांसी लगाकर या आग में जलकर, जल में
डूबकर, पर्वतादि से गिरकर आत्महत्या कर ले तो उसकी गति इस
प्रकार होती है ॥ १ ॥
पूय-शोणित-सम्पूर्णे त्वन्धे तमसि मज्जति ।
षष्टिवर्ष-सहस्राणि नरकं प्रतिपद्यते ॥ २ ॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal