पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
by महर्षि पराशर
Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)
Page 38 of 170
Read in contextCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
२६ पाराशरस्मृतिः [ तृतीयो-
जन्मकर्म-परिश्रष्टः सन्ध्योपासनवर्जितः ।
नामधारक-विप्रस्य दशाहं सूतकं भवेत् ॥ ६ ॥
जो ब्राह्मण जन्म से ही अपने कर्म (अध्ययन, अध्यापनादि षट्कर्म)
से परिभ्रष्ट हो तथा सन्ध्योपासन आदि नित्यकर्म से रहित हो, वह
केवल नाममात्र से ही ब्राह्मण हो, उसे दश दिनों का अशौच लगता
है ॥६॥
अजा गावो महिष्यश्च ब्राह्मणी नवसूतिका ।
दशरात्रेण संशुद्ध्येद् भूमिष्ठं च नवोदकम् ॥ ७ ॥
बकरी, गाय, भैंस तथा ब्राह्मणी नव-प्रसूता होने पर दश दिनों में
शुद्ध हो जाती हैं। इसी प्रकार वर्षा का जल यदि पृथिवी पर एकत्र हो
गया हो तो वह भी दश दिनों में शुद्ध हो जाता है ॥७॥
एकपिण्डास्तु दायादाः पृथग् दारनिकेतनाः ।
जन्मन्नपि विपत्तौ च तेषां तत्सूतकं भवेत् ॥ ८ ॥
सपिण्ड (सात पीढ़ी) के भीतर भिन्न-भिन्न जाति की स्त्रियों से
उत्पन्न होनेवाले तथा पृथक्-पृथक् गृहों में निवास करनेवाले पुत्र
परस्पर दायाद कहे जाते हैं। उन्हें भी जननाशौच तथा मरणाशौच
उसी प्रकार लगता है, जिस प्रकार पुत्रादि के उत्पन्न होने पर पिता
को लगता है ॥८॥
प्राप्नोति¹ सूतकं गोत्रे चतुर्थपुरुषेण तु ।
दायाद् विच्छेदमाप्नोति पञ्चमो वाऽऽत्मवंशजः ॥ ९ ॥
गोत्र में भिन्न जाति की स्त्री से उत्पन्न पुरुष की चार पीढ़ी तक
अशौच लगता है। मूल पुरुष की भिन्न जाति की स्त्री से उत्पन्न पाँचवाँ
पुस्त पिण्ड का अधिकारी नहीं रहता ॥९॥
१. 'तावत्तत्' इति पा० ।
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal