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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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Page 494

भाषाटीकासमेतम् । ( ४७९ )
अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचारविवर्जिताः ।
सर्वे ते हास्यतां यान्ति यथा ते मूर्खपण्डिताः ॥ ४३ ॥”
कि, शास्त्रमे कुशल भी लोकाचार न जाननेके कारण उन मूर्ख पंडितोकी
समान वे सभी हास्यताको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥”
तत् श्रुत्वा चक्रधर आह–“अहो ! अकारणमेतत् ।
यह सुनकर चक्रधर बोला--“अहो ! यह तो अकारण है ।
बहुबुद्धयो विनश्यन्ति दुष्टदैवेन नाशिताः ।
स्वल्पबुद्धयोऽप्येकास्मिन् कुले नन्दन्ति सन्ततम् ॥ ४४ ॥
दुष्ट दैवसे नाशित होकर महाबुद्धिमान् भी नष्ट होते हैं और स्वल्पबुद्धिवाले
भी एक कुलमे निरन्तर आनन्दको प्राप्त होते है ॥ ४४ ॥
उक्तञ्च-
कहा है कि-
अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं
सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः
कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति ॥ ४५ ॥
नहीं रक्षित किया दैवसे रक्षित होकर स्थित रहता है, भली प्रकार रक्षा
किया हुआभी दैवसे हत होनेके कारण नष्ट हो जाता है, वनमे विसर्जन किया
अनाथ भी जीता है, और यत्न करनेपर घरमें भी नही जीता ॥ ४५ ॥
तथाच-
और देखो-
शतबुद्धिः शिरस्थोऽयं लम्बते च सहस्रधीः ।
एकबुद्धिरहं भद्रे क्रीडामि विमले जले ॥ ४६ ॥”
यह शतबुद्धि शिरपर है और यह सहस्रबुद्धि लटकता है हे भद्रे ! मै एक-
बुद्धि हू जो उज्ज्वल जलमें क्रीडा करता हू ॥ ४६ ॥
सुवर्णद्धिः आह,-कथमेतत्” स आह,-
सुवर्णसिद्धि बोला-“यह कैसे?” चक्रधर बोला-