Skip to content
SarvaKosh
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

Page 46 of 536

Read in context
Page 46

भाषाटीकासमेतम् । (३१)
रेशम कीडोंसे, सुवर्ण पाषाणसे, दूर्वा गौके रोमसे, कमल कीचडसे, चन्द्रमा
सागरसे, इन्दीवर (कमल) गोबरसे, अग्नि काष्ठसे, मणि सर्पके फणसे, रोचन
गोपित्तसे उत्पन्न होता है, गुणी अपने गुणोंके उदयसे प्रकाशित होते हैं न कि
जन्मसे ॥ १०३ ॥
मूषिका गृहजातापि हन्तव्या स्वापकारिणी ।
भक्ष्यप्रदानैर्मार्जारो हितकृत्प्रार्थ्यते जनैः ॥ १०४ ॥
घरमें उत्पन्न हुई अपना अपकार करनेवाली मूषिकाभी मारने योग्य है, हित-
कारी बिलावको भक्ष्य दान देकरभी लानेकी मनुष्य प्रार्थना करते हैं ॥ १०४ ॥
एरण्डभिण्डार्कनलैः प्रभूतैरपि सञ्चितैः ।
दारुकृत्यं यथा नास्ति तथैवाज्ञैः प्रयोजनम् ॥ १०५ ॥
जिस प्रकार बहुतसे एरण्ड भिण्ड आक नलसे कुछ काठका प्रयोजन नहीं
निकलता इसी प्रकार अज्ञोंसे प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है ॥ १०५ ॥
किं भक्तेनासमर्थेन किं शक्तेनापकारिणा ।
भक्तं शक्तं च मां राजन् नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ १०६ ॥”
असमर्थ भक्त और अपकारी सामर्थ्यवान् पुरुषसे क्या है, हे राजन् ! मुझ
भक्त और समर्थकी अवज्ञा करनेको आप योग्य नहीं हैं ॥ १०६ ॥”
पिंगलक आह-“भवतु एवं तावत् । असमर्थः समर्थो वा
चिरन्तनः त्वमस्माकं मन्त्रिपुत्रः तद्विश्रब्धं ब्रूहि यत् किंचि-
द्वक्तुकामः”। दमनक आह-“देव ! विज्ञाप्यं किंचिदस्ति”।
पिंगलक आह-“तन्निवेद्य अभिप्रेतम्”। सोऽब्रवीत्-
पिंगलक बोला-“हो यह समर्थ वा असमर्थ, परन्तु तुम हमारे पुराने मंत्रि-
पुत्र हो सो जो तेरे कहनेकी इच्छा है, निर्भय कहो” दमनक बोला-“देव !
कुछ कहना तो है।” पिंगलक बोला-“अपना अभीष्टकहो” वह बोला-
“अपि स्वल्पतरं कार्यं यद्भवेत्पृथिवीपतेः ।
तन्न वाच्यं सभामध्ये प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥ १०७ ॥
“राजाका जो अत्यन्त छोटासाभी कार्य हो वह सभामे नहीं कहना चाहिये
ऐसा बृहस्पतिने कहा है ॥ १०७ ॥