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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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( ३९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
गुणेषु रागो व्यसनेष्वनादरो
रतिः सुभृत्येषु च यस्य भूपतेः ।
चिरं स भुङ्क्ते चलचामरांशुकं
सितातपत्राभरणां नृपश्रियम् ॥ २६५ ॥
गुणोंमें प्रीति व्यसनोंमें अनादर सुभृत्योंमें प्रीति जिस राजाकी होती है वह
चलायमान चंवरही अंशुक ( वस्त्र ) जिसके श्वेत छत्रही जिसका आभरण ऐसी
राज्यलक्ष्मीको चिरकालतक भोगता है ॥ २६५ ॥
न च त्वया प्राप्तराज्योऽहमिति मत्वा श्रीमदेन आत्मा
व्यंसयितव्यः, यत् कारणं चला हि राज्ञो विभूतयः । वंशा-
रोहणवत् राज्यलक्ष्मीः दुरारोहा, क्षणविनिपातरता, प्रय-
त्नशतैरपि धार्य्यमाणा दुर्धरा, प्रशस्ताराधितापि अन्ते
विप्रलम्भिनी, वानरजातिरिव विद्रुतानेकचित्ता, पद्मपत्रो-
दकमिवाघटितसंश्लेषा, पवनगतिरिव अतिचपला, अना-
र्य्यसङ्गतमिव अस्थिरा, आशीविष इव दुरुपचारा, सन्ध्या-
भ्रलेखेव मुहूर्त्तरागा, जलबुद्बुदावलीव स्वभावभंगुरा,
शीरप्रकृतिरिव कृतघ्ना, स्वप्नलब्धद्रव्यराशिरिव क्षणदृष्टन-
ष्टा । अपिच-
और तुम कहो कि मुझे राज्य मिलगया है ऐसा मानकर लक्ष्मीके मदसे
आत्माको प्रतारण नहीं करना चाहिये । जिस कारणसे कि राजोंके ऐश्वर्य्य
चलायमान होते हैं । बांसके चढ़नेकी समान राज्य लक्ष्मीकी प्राप्ति कठिन है ।
क्षणमात्रमें विनाश होनेवाली, सैकड़ों प्रयत्नोंसे धारण करनेपरभी दुर्धर, भली
प्रकार आराधित होनेपरभी अन्तमें वंचना करनेवाली, बानर जातिकी समान
चपल अनेक चित्तवाली, कमलपत्रमें जलकी समान अत्यन्त सम्बन्धसे रहित,
पवन गतिकी समान अति चपल, असाधु संगतिकी समान अस्थिर, सर्प विषकी
समान दुश्चिकित्स्य, संध्याके मेघकी समान मुहूर्त्तमात्रको अनुरागवाली, जलके
बुलबुलोंके समूहकी समान स्वभावसे भंग होनेवाली, हलके अग्रभागकी समान
कृतघ्न, स्वप्नमें प्राप्त हुए द्रव्यसमूहकी समान देखनेपर क्षणमात्रमें नष्ट होनेवा-
ली ऐसी राजलक्ष्मी है । औरभी-