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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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Page 347

( ३३२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
इत्यभिधाय तस्योपरि समारुह्य लघुभिश्चञ्चुप्रहारैस्तं प्रहृत्य
आहतरुधिरेण प्लावयित्वातदुपदिष्टं ऋष्यमूकपर्वतं सपरि-
वारो गतः । एतस्मिन्नन्तरे कृकालिकाया द्विषत्प्रणिधिभूतया
तत् सर्वं मेघवर्णस्य अमात्यस्य व्यसनमुलूकराजस्य निवे-
दितम् । "तत् तव अरिः सम्प्रति भीतः क्वचित् प्रचालितः
सपरिवार इति" । अथ उलूकाधिपः तदाकर्ण्य अस्तमन-
वेलायां सामात्यः सपरिजनों वायसवधार्थं प्रचालितः प्राह
च,-"त्वर्य्यताम् त्वर्य्यताम् । भीतः शत्रुः पलायनपरः पुण्यै
र्लभ्यते । उक्तञ्च-
सो तुम इस विषयमें मुझे निषेध मतकरो" । ऐसा कह उसके साथ सूखा
क्लेश करना प्रारम्भ किया ? तब दूसरे उसके भृत्य स्थिरजीवीको उच्छृंखलवच-
नोंसे जल्पना करते देखकर उसके वधके निमित्त उद्यतहुए मेघवर्ण द्वारा कहेगये
“अहो! तुम निवृत्त हो मैं इस शत्रुपक्षपाती दुरात्माका आपही निग्रह करूंगा"
ऐसा कह उसके ऊपर चढ, लघुचोंचके प्रहारोंसे उसको प्रहार कर लाये हुए
रुधिरसे रंगकर उसके उपदेश किये ऋष्यमूक पर्वतमें परिवार सहित गया । इसी
समय शत्रुके प्रणिधिभूत दूती हुई कृकालिकाने उस सब मेघवर्णके अमात्यका
दुःख उलूक राजाके आगे कह दिया । कि, "तुम्हारा शत्रु इस समय डरा हुआ
परिवार सहित कहीं चलागया" । तब उलूकराज यह सुनकर अस्तके समय
अमात्य परिजन सहित वायसके वधके निमित्त चला । और बोला-"शीघ्रता
करो । शीघ्रता करो । डराहुआ शत्रु भागनेमें तत्पर पुण्यसेही प्राप्त होता है।
कहाहै-
शत्रोः प्रचलने छिद्रमेकमन्यच्च संश्रयम् ।
कुर्वाणो जायते वश्यो व्यग्रत्वे राजसेविनाम् ॥ १२८ ॥”
शत्रुके पलायनमें एक छिद्रका अवलम्बन होनेसे तथा राजसेवियोंके व्यग्रहोनेसे
उनके वशीभूत होजाताहे (राजा प्रियकारी सेवकोंके आधीन होजाताहै) १२८
एवं ब्रुवाणः समन्तात् न्यग्रोधपादपमधः परिवेष्ट्य व्यव-
स्थितः । यावत् न कश्चित् वायसो दृश्यते । तावत् शाखाग्रम
धिरूढो हृष्टमना वन्दिभिः अभिष्टूयमानोऽरिमर्दनः तान् परि-