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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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Page 302

भाषाटीकासमेतम् । ( २८७ )
क्षुत्क्षामोऽत्र वने भ्रमामि शिशुकैस्त्यक्तः समं भार्य्यया
यच्चान्यन्न कृतं कृतान्त कुरु ते तच्चापि सह्यं मया ॥२०३॥”
हे कृतान्त ! बन्धनमें प्राप्त हुआभी बडा मृग तैने मेरा हरण कर लिया,
और प्राप्त आ यह कच्छपभी तुम्हारी आज्ञासे निश्चित नष्ट होगया। अब क्षुधासे
घबराया हुआ इस वनमें भार्य्यापुत्रसे त्यागन किया हुआ भ्रमण करता हूँ जो
और अनिष्ट नहीं किया सोभी कर वह मैं तेरा सब सहन करलूंगा ॥ २०३ ॥
एवं बहुविधं विलप्य स्वगृहं गतः। अथ तस्मिन्व्याधे
दूरतरं गते सर्वेऽपि ते काककूर्ममृगमूषकाः परमानन्दभाजः
परस्परमालिङ्ग्य पुनर्जातमिव आत्मानं मन्यमानाः तदेव
सरः सम्प्राप्य महासुखेन सुभाषितकथागोष्ठीविनोदेन कालं
नयन्ति स्म। एवं ज्ञात्वा विवेकिना मित्रसंग्रहः कार्य्यः । न
च मित्रेण सह व्याजेन वर्तितव्यम् । इति । उक्तञ्च यतः-
इस प्रकार अनेक विधि विलाप कर अपने घर गया । तब उस व्याधके
अति दूर जानेपर वे काक कूर्म मृग मूषक परमानन्दको प्राप्त हुए परस्पर
आलिंगन कर अपनेको पुनः जन्मवाला मानकर उसी अपने सरोवरको प्राप्तहो
महासुखपूर्वक सुवचन कथा गोष्ठीके आनंदसे समयको बिताते भये । ऐसा
जानकर बुद्धिमान्‌को मित्रोंका सग्रह करना चाहिये मित्रके सग कपटसे वर्तना
न चाहिये । कहा है कारण-
यो मित्राणि करोत्यत्र न कौटिल्येन वर्तते ।
तैः समं न पराभूतिं सम्प्राप्नोति कथञ्चन ॥ २०४ ॥
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रके मित्रसम्प्राप्तिर्नाम
द्वितीयं तन्त्रं समाप्तम् ।
जो इस संसारमें मित्र करता है और उनके साथ कुटिलतासे नहीं वर्तता है
वह उनके साथ कभी पराभवको प्राप्त नहीं होता है ॥ २०४ ॥
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां
मित्रसम्प्राप्तिर्नाम द्वितीयं तन्त्रं सम्पूर्णम् ॥