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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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( २७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राण नाश उपस्थित होनेमें जो मित्रका दर्शन हो जाय तो दोनोंही प्रका-
रसे अर्थात् मित्रके कौशलसे जीवन और मृतक होनेसे उसके संस्कारसे सद्गति
दोनोंही सुख होते हैं ॥ १८३ ॥
तत् क्षन्तव्यं यन्मया प्रणयात् सुभाषितगोष्ठीषु अभिहि-
तम् । तथा हिरण्यकमन्थरकौ मम वाक्याद्वाच्यौ-
सो क्षमा करना जो मन प्रणयसे वार्त्तालापमें यदि कुछ (अनुचित) कहा
हो और हिरण्यक मन्थरकसेभी मेरी ओरसे कहना-
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि दुरुक्तं यदुदाहृतम् ।
तत्क्षन्तव्यं युवाभ्यां मे कृत्वा प्रीतिपरं मनः ॥ १८४ ॥”
अज्ञान वा ज्ञानसे जो मैंने कभी तुम्हारे वचनको लौट दिया हो सो मेरे
ऊपर प्रीति करके तुमको क्षमा करना चाहिये ॥ १८४ ॥”
तत् श्रुत्वा लघुपतनक आह-“भद्र ! न भेतव्यं अस्म-
द्विधैर्मित्रैर्विद्यमानैः, यावदहं द्रुततरं हिरण्यकं गृहीत्वा
आगच्छामि । अपरं ये सत्पुरुषा भवन्ति ते व्यसने न व्याकु-
लत्वमुपयान्ति । उक्तञ्च-
यह सुनकर लघुपतनक बोला.-“भद्र हमसरीखे मित्रोंके विद्यमान होनेमें
भय मतकरो । जबतक मैं शीघ्रतासे हिरण्यकको लेकर आऊं । और जो सत्पु-
रुष होते हैं वे व्यसन उपस्थित होनेमें घबडाते नहीं हैं । कहा है-
सम्पदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे न भीरुत्वम् ।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥१८५॥”
जो सम्पत्तिमें हर्ष, विपत्तिमें दुःख, युद्धमें भीरुता नहीं करता है उस
तीनों भुवनके तिलक किसी एकही पुत्रको कोई माता उत्पन्न करती है॥१८५॥”
एवमुक्त्वा लघुपतनकः चित्राङ्गं आश्वास्य यत्र हिरण्यक-
मन्थरकौ तिष्ठतस्तत्र गत्वा सर्वं चित्रांगपाशपतनं कथित-
वान् । हिरण्यकश्च चित्राङ्गपाशमोक्षणं प्रति कृतनिश्चयं पृष्ठ-
मारोप्य भूयोऽपि सत्वरं चित्रांगसमीपे गतः । सोऽपि
मूषकमवलोक्य किञ्चित् जीविताशया संश्लिष्ट आह-