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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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Page 219

(२०४) पञ्चतन्त्रम् ।

आता है, सो नहीं जानते कि, आज क्या वटनिवासी पक्षियोंका संक्षय होगा
या नहीं" । इस प्रकार बहुत प्रकार विचार कर उसी क्षणमें लौटकर उस
वटवृक्षपर जाकर सब पक्षियोसे बोला- "भो ! यह दुरात्मा लुब्धक जाल और
चावल हाथमें लिये आता है, सो सब प्रकार इसका विश्वास मत करना यह जाल
फैलाकर चावल बिखेरेगा । वे चावल तुम सब कालकूट विषकी समान जानना"।
उसके ऐसा कहनेपर वह लुब्धक वटके तले आय जाल फैलाकर सिन्धुवारकी
समान चावलोको बिखेरकर थोड़ी दूर जाकर एकान्तमें स्थित हुआ, तब वहां
स्थित हुये वे पक्षी लघुपतनकके वाक्यरूपी अर्गलासे निवारित हुए उन चाव-
लोको हलाहल विषके अंकुरोंकी समान देखते हुए एकान्तमें स्थित भये । इसी
समय चित्रग्रीव नाम कपोतराजा सहस्रकुटुम्बके सहित प्राणयात्राके निमित्त
घूमता हुआ उन चावलोंको दूरसेभी देखता हुआ लघुपतनकसे निवारित होकर
भी जिह्वाके चंचलतासे भक्षणके लिये प्राप्त होकर परिवार सहित बन्धनमें पडा ।
अच्छा कहाभी है-
जिह्वालौल्यप्रसक्तानां जलमध्यनिवासिनाम् ।
अचिन्तितो वधोऽज्ञानां मीनानामिव जायते ॥ ३ ॥
जिह्वाके लालचमें प्रसक्त हुए जलके मध्यमें रहनेवालों मच्छियोंकी समान
अज्ञानियोंका अचिन्तित वध होता है ॥ ३ ॥
अथवा दैवप्रतिकूलतया भवति एवं, न तस्य दोषोऽस्ति ।
उक्तञ्च-
अथवा दैवकी प्रतिकूलतासे ऐसा होता है उसका दोष नहीं है । कहा है-
पौलस्त्यः कथमन्यदारहरणे दोषं न विज्ञातवान्
रामेणापि कथं न हेमहरिणस्यासम्भवो लक्षितः ।
अक्षैश्चापि युधिष्ठिरेण सहस प्राप्तो ह्यनर्थः कथं
प्रत्यासन्नविपत्तिमूढमनसां प्रायो मतिः क्षीयते ॥ ४ ॥
रावणने दूसरेकी स्त्रीके हरनेका दोष क्यों न जाना, रामचन्द्रने सुवर्णके
हरिणकी असंभवता क्यों न जानी, युधिष्ठिरने अक्षोंके खेलनेसे एक साथ
अनर्थ क्यों न जाना, प्रायः विपत्ति आनेसे मूढमन होजाने वालोंकी बुद्धि
क्षीण होजाती है ॥ ४ ॥