पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम्। ( १८९ )
धर्मबुद्धिः प्राह-“कथमेतत् ?” ते प्रोचुः।
धर्मबुद्धि बोला-“यह कैसे ?” वे बोले-
कथा २०.
अस्ति कस्मिंश्चिद्वनोद्देशे बहुबकसनाथो वटपादपः।
तस्य कोटरे कृष्णसर्पः प्रतिवसति स्म। स च बकबाल-
कानजातपक्षान् अपि सदैव भक्षयन् कालं नयति।
अथ एको बकस्तेन भक्षितानि अपत्यानि दृष्ट्वा शिशु-
वैराग्यात् सरस्तीरमासाद्य बाष्पपूरपूरितनयनः अधोमुख-
स्तिष्ठति। तञ्च तादृक्चेष्टितमवलोक्य कुलीरकः प्रोवाच,-
“माम! किमेवं रुद्यते भवता अद्य?”। स आह-“भद्र! किं
करोमि, मम मन्दभाग्यस्य बालकाः कोटरनिवासिना सर्पेण
भक्षिताः, तद्दुःखदुःखितोऽहं रोदिमि। तत् कथय मे यदि
अस्ति कश्चिदुपायः तद्विनाशाय?”। तदाकर्ण्य कुलीरकः
चिन्तयामास। “अयं तावत् अस्मज्जातिसहजवैरी तथा
उपदेशं प्रयच्छामि सत्यानृतं यथान्येऽपि बकाः सर्वे संक्षय-
मायान्ति। उक्तञ्च-
किसी एक वनमें बहुत वगलोंसे युक्त वटका वृक्ष था उसकी खखोडलमें
काला सांप रहताथा। वह पंख न निकले बगलेके बच्चोंको सदा भक्षण करता
समय बिताता। तब एक बगला उसके भक्षण किये सन्तानोंको देखकर बाल-
कोंके वैरागसे नदीके किनारे आकर नेत्रोंमें जलभरे नीचेको मुख किये स्थित
था। उसकी यह चेष्टा देखकर कुलीरक बोला-“मामा ! आज तुम क्यों
रोतेहो ?” । वह बोला,-“भद्र ! क्या करूं मुझ मन्दभाग्यके बालक खोडलमें
रहनेवाले काले सर्पने खाहिये। उसके दुःखसे दुःखी हुआ मैं रोताहू सो मुझसे
कह यदि कोई उस सापके नाशका उपाय हो तो ?” यह सुनकर कुलीरक
चिन्ता करने लगा। “यह तो हमारी जातिका सहज वैरी है ऐसा उपदेश दूं
कि, सत्य और अनृत हो जिससे सब बगले नाश हो जायेंगे। कहाहै-
नवनीतसमां वाणीं कृत्वा चित्तं तु निर्दयम्।
तथा प्रबोध्यते शत्रुः सान्वयो म्रियते यथा ॥ ४४० ॥”