पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in context( ११४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
संजीवकः शष्पभोजी, भवान् मांसादः तव प्रकृतयश्च ।
यत्तव अवध्यव्यवसायबाह्यं कुतस्तासां मांसाशनम् । यद्र-
हितास्ताः त्वां त्यक्त्वा यास्यन्ति । ततोऽपि त्वं विनष्ट एव
अस्य सङ्गत्या पुनस्ते न कदाचित् आखेटके मतिर्भवि-
ष्यति । उक्तञ्च-
और आपने तो इसकी मित्रतासे सम्पूर्ण ही राजधर्म त्याग न करदियाहे। राज-
धर्मके अभावसे सम्पूर्ण परिजन विरक्त होकर गये, जो यह संजीवक तृणभोजी
आप मांसभक्षी और आपके प्रकृति (कुटुम्ब) भी, जो कि अब मांस भक्षण
तुम्हारे पराक्रमसे बाह्य होगयाँ (तुम उद्योग नहीं करतेहो) तो फिर वह मांस
कहासे खायेंगे इसकारण वे तुमको त्यागन कर चले जायेंगे । इसीसे तुम विनष्ट
होंगे । इसकी संगतिसं तुम्हारी आखेटमें कभी बुद्धि नहीं होगी । कहाहै-
यादृशः सेव्यते भृत्यैर्यादृशांश्चोपसेवते ।
कदाचिन्नात्र सन्देहस्तादृग्भवति पूरुषः ॥ २७२ ॥
जब जो जैसे भृत्योंसे सेवन किया जाता है वा जो जैसोंको सेवन करता है
इसमें सन्देह नहीं वह पुरुष वैसाही होजाताहै ॥ २७२ ॥
तथाच-
तैसेही-
सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते ।
स्वातौ सागरशुक्तिकुक्षिपतितं तज्जायते मौक्तिकं
प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणः संवासतो जायते ॥ २७३ ॥
तपेहुए लोहेपर पडेहुएँ जलका नाममात्रभी नहीं :विदित होता है और
वही कमलपत्रके ऊपर मोतीके आकारमें स्थितहुआ शोभा पाता है, स्वा-
तिनक्षत्रमें सागरमें सीपीमें प्रवेशकर वही मोती होजाता है, प्रायः संगतिसे
अधम, मध्यम, उत्तम गुण होजाते हैं ॥ २७३ ॥
तथाच-
और देखो--