पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextपंचकोशविवेकप्रकरणम् ७५
लीना सुप्तौ वपुर्बोधे व्याप्नुयादानखाग्रगा ।
चिच्छायोपेतधीर्नात्मा विज्ञानमयशब्दभाक् ॥७॥
चिच्छाया से युक्त जो बुद्धि, सुषुप्तिकाल में लीन होजाती
है, तथा जागने पर नखाग्र तक शरीर को व्याप्त किये रहती
है, वह विज्ञानमय कहाने वाली बुद्धि भी तो आत्मा नहीं है
[बताओ कि विलय आदि अवस्थाओं में फंस जानेवाली बुद्धि
आत्मा कैसे हो ? ]
कर्तृत्वकरणत्वाभ्यां विक्रियेतान्तरिन्द्रियम् ।
विज्ञानमनसी अन्तर्बहिःस्थैते परस्परम् ॥८॥
[मनोमय तथा विज्ञानमय का भेद इस श्लोक में बताया जाता
हैं] अन्दर की इन्द्रिय जिसे मन भी कहते हैं, कभी तो कर्त्ता-
रूप से तथा कभी करणरूप से परिणत होती रहती है। जब
कर्त्तारूप से परिणत होती है तब उसको 'विज्ञानमय कोश'
कहते हैं। जब करणरूप से परिणत होती है तब उस को
'मनोमय कोश' कहा जाता है। ये दोनों आपस में अन्दर
बाहर रहा करते हैं [बुद्धि अन्दर रहती है, मन बाहर रहता
है, उसी से एक के ही दो कोश हो गये हैं।]
काचिदन्तर्मुखा वृत्तिरानन्दप्रतिविम्बभाक् ।
पुण्यभोगे, भोगशान्तौ निद्रारूपेण लीयते ॥९॥
जब हम किसी पुण्यकर्म के फल का अनुभव करते हैं,
तब कोई बुद्धिवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है और उस पर आनन्द
का प्रतिविम्ब पड़ जाता है, तथा भोगों के शान्त हो जाने पर
वही बुद्धिवृत्ति निद्रारूप से विलीन हो जाती है। [उस लीन
बुद्धिवृत्ति को ही 'आनन्दमय' कहा जाता है।]