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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३५
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वृत्तियों में दो तरह का हो जाता है। इसी को विस्तार से यों समझो
कि मलिन होने के कारण 'घोर' और 'मूढ' वृत्तियों में ब्रह्म का
सुखभाग ढका रहता है—दीखता नहीं। उनमें क्योंकि थोड़ी सी ही
निर्मलता रहती है इस कारण केवल चिदंश का ही प्रतिबिम्ब पड़ा
करता है। दूसरा उदाहरण यह भी है कि निर्मल जल में अग्नि की
गरमी तो आ जाती है प्रकाश नहीं आता। इसी तरह 'घोर' और
'मूढ' वृत्तियों में केवल चेतनभाग का ही उद्भव होता है सुखभाग
का नहीं होता। काष्ठ में जैसे उष्णता और प्रकाश दोनों ही उद्भूत
हो जाते हैं, इसी तरह 'शान्त' वृत्तियों में सुख और चैतन्य दोनों
ही उद्भूत हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? इसका उत्तर तो हम
यही देंगे कि इनका स्वभाव ही ऐसा है। इनके इस स्वभाव को
देखकर नियामक को ढूँढ निकालो। देखते हैं कि—'घोर' या 'मूढ'
कोई सी भी अवस्था जब हो—उस समय सुख का अनुभव होता
ही नहीं। यह भी देखा जाता है कि—'शान्त' वृत्तियों में तो सुखा-
नुभव होता ही है। घर या खेत आदि की कामना जब किसी के
मन में जाग जाती है तब वह राजस काम, घोर होने से सुख को
उद्भूत होने ही नहीं देता। देखलो कि—यह मेरा काम सिद्ध होगा
या नहीं ? यह विचार जब आता है तब दुःख होने लगता है। जब
काम सिद्ध नहीं होता तब दुःख बढ़ने लगता है। जब कोई उस
काम में रुकावट डालता है तब क्रोध आने लगता है। जब अपनी
कामना के विरुद्ध बात देखनी पड़ जाती है तब उससे द्वेष होने
लगता है। जब वह उसका कुछ इलाज नहीं कर सकता तब उस
समय जो विषाद होता है वह 'तामस' है। इन क्रोधादियों में तो
बड़ा ही दुःख होता है। इनमें सुख की तो थोड़ी सी भी संभावना
नहीं होती। काम्य पदार्थ का लाभ जब किसी को हो जाय