Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 695 of 726

Read in context
Page 695

ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०७
ऐसे ही आत्मा हैं, जैसे देवदत्त को कोई शेर कह दे और वह
शेर कहाने लग पड़ा हो। क्योंकि उनका भेद तो प्रत्यक्ष ही
भास रहा है। इस कारण पुत्रादि को 'गौण आत्मा' मानना
चाहिए। साक्षी और पांच कोश अलग अलग हैं ही, परन्तु यह
भेद हर किसी को मालूम नहीं है। जैसे ठूंठ का ही मिथ्या चोर
हो जाता है ऐसे ही ये कोश 'मिथ्या आत्मा' बन गये हैं। अब
तीसरे आत्मा को भी सुन लीजिए- साक्षी का भेद है भी नहीं
और भासता भी नहीं। क्योंकि वह साक्षी सर्वान्तर है। वही साक्षी
'मुख्य आत्मा' कहाता है। यहाँ तक आपको यह तो स्पष्ट
मालूम हो ही गया कि- तीन तरह का आत्मा होता है। अब
इतना और जान लीजिए कि जिस व्यवहार में इन तीनों में से
जिसका आत्मा होना ठीक जंच पड़े, उस प्रसंग के लिए उसी
को मुख्य आत्मा मान लो। शेष को उसका अंग मान लो।
जो मरने लगा है, उसे घर की रक्षा के लिए तो गौण आत्मा
[पुत्रादि] ही चाहिए। क्योंकि मिथ्या आत्मा [शरीर] तो मरने
ही लगा है तथा मुख्य आत्मा [साक्षी] इन बखेड़ों में पड़ता ही
नहीं है। इस कारण मरते समय पुत्रादि ही मुख्य आत्मा
माने जाते हैं। जब कोई कमजोर होकर पुष्टिकर अन्न खाना
चाहता है, तब उसे देहात्मा को ही खिलाना होगा ! वह पुष्टि-
कारक अन्न पुत्र को खिला बैठेगा तो पुष्टि कैसे होगी ? तथा
मुख्यात्मा कुछ खायेगा ही नहीं। ऐसे स्थलों में 'मिथ्या आत्मा'-
यह देह- ही मुख्य आत्मा हो सकता है। जब कोई शरीर को
सुखाने वाला घोर तप करता है तब वह लोकान्तर में जाने वाले
विज्ञानमय को आत्मा मान रहा है। जब तो कोई मुक्ति चाहता
है तब चैतन्य ही आत्मा होना चाहिए। कहने का तात्पर्य यही