Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 668 of 726

Read in context
Page 668

८० पंचदशी
इस ओंकाररूपी आलम्बन को जान ले तो वह जो चाहे वहीं उसे
मिले। प्रकरण में तो हमें केवल इतना ही कहना है कि—
जो निर्गुणब्रह्म की उपासना भले प्रकार कर लेता है वह इस लोक
में या मरते समय या फिर ब्रह्मलोक में जाकर, ब्रह्म का साक्षात्कार
करके ही छोड़ता है। आत्मगीता में भी कहा है कि—जो विचार
न कर सकते हों, उन्हें तो निर्गुण ब्रह्म की उपासना निरन्तर ही
करनी चाहिये। आत्मगीता में यह भी कहा है कि—जिसमें
आत्मसाक्षात्कार करने की शक्ति न हो, वह निःशंक होकर मेरी
उपासना ही किया करे। समय आने पर मैं उसके अनुभव में
आऊंगा और निश्चय ही फलित होकर रहूंगा। अगाध खज़ाना पाना
हो तो जैसे खोदना ही होगा, ऐसे ही मुझे पाना हो तो आत्म-
चिन्ता करनी ही होगी। पुरुष को चाहिये कि—बुद्धि रूपी कुदाल
से देह-रूपी रोड़े को दूर हटा दे। मनरूपी भूमि को बार बार
खोदे और अन्त में मुझ गुप्त निधि को प्राप्त करके ही छोड़े। यदि
किसी को अनुभूति न भी हो तो भी उसे 'अहं ब्रह्मास्मि' मैं ब्रह्म
तत्व हूं' यह उपासना अवश्य करनी चाहिये। ध्यान का तो इतना
महाप्रताप है कि उससे असत् भी मिल जाता है। नित्य प्राप्त जो
सर्वात्मक ब्रह्म है वह ध्यान से मिलेगा या नहीं? ऐसी तो शंका ही
कभी न करो। ध्यान करके देखो तो पता चले कि—ध्यान करने
से दिन पर दिन अनात्मबुद्धि ढीली पड़ती जाती है। ध्यान के इस
महाफल को देखकर भी यदि कोई ध्यान नहीं करता है तो वह बड़ा
ही अभागा है। सम्पूर्ण प्रकरण का सार तो यही है कि—यदि कोई
ध्यान से देहाभिमान को खोदे और अपने अद्वितीय आत्मा के
दर्शन करले, तो यह अनादिकाल से मरने वाला प्राणी ही अमर हो
जाय और इसी जन्म में सच्चिदानन्द ब्रह्म के दर्शन करके छोड़े।