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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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७८ पंचदशी
छोड़ कर जो लोग तीर्थों में टकराते हैं, और जपादि में व्यस्त पड़े
रहते हैं, वे तो ऐसे हैं जैसे हाथ पर रक्खे गुड़ को फेंक कर कोई
हाथ को ही चाटने लगता हो । विचारक के सामने तो उपासक
का दर्जा भी बहुत नीचा होता है, यह बात कभी न भूलनी चाहिए।
यही कारण है कि—विचार न कर सकने की अवस्था में ही 'योग'
किंवा 'उपासना' का विधान किया गया है। जिन पुरुषों के चित्त
अत्यन्त व्याकुल हुए रहते हैं, उन को विचार से तत्वज्ञान हो ही
नहीं सकता, उन के लिए तो 'योग' ही मुख्य उपाय है। क्योंकि
योग करने से उनका धीदर्प नष्ट हो जाता है। जिन महापुरुषों
की बुद्धि कभी व्याकुल नहीं होती, जिन का आत्मा केवल मोह के
आवरण में छिपा रहता है, उनके लिए तो 'सांख्य' नाम का विचार
ही मुख्य उपाय है। क्योंकि उन्हें उसी से झटपट सिद्धि मिल जाती
है। गीता में कहा है कि—'सांख्यमार्गी' जिस परमपद को पाते हैं
'योगमार्गी भी वहां पहुंच जाते हैं। जिस ज्ञानी को यह मालूम है
कि परिणाम में जाकर 'सांख्य' और 'योग' एक ही हैं, जिसे
इनमें भेद नहीं दीखता, उसी को शास्त्र का मर्मज्ञ
समझ लो।
जिसकी तो उपासना भी इस जन्म में अधकचरी रह गयी हो,
वह या तो मरते समय या फिर ब्रह्मलोक में जाकर तत्व का ज्ञाता
होता है और मुक्त हो जाता है।
मरते समय इस जन्म के विचारों का निचोड़ (सार) प्रकट
होने लगता है अर्थात् मरते समय इस जन्म के जो सब से पिछले
विचार होते हैं, उनसे यह पता चल ही जाता है कि—अगला
जन्म कैसा और काहे का होगा ? बच्चों को पिछले जन्म के और
वृद्ध को अगले जन्म के सपने आने लगते हैं। जीवन के पिछले ज्ञान