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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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७४ पंचदशी
देता है। फिर बताओ कि इसका व्यवहार कैसे रुकेगा ? यह मत
कह बैठना कि तत्वज्ञानी भी चित्त का उपमर्दन तो करता ही है।
अरे भाई ! यह बात तो तुम 'ध्याता' की कह रहे हो। तत्वज्ञानी
पुरुष कभी भी चित्त का उपमर्दन नहीं कर सकता। भला क्या
कहीं घटतत्व को जानने वाला पुरुष भी बुद्धि का मर्दन किया
उसे एकाग्र करता देखा जाता है ? यदि केवल एकवार ज्ञान हो
जाने पर फिर घट जैसा जड़ पदार्थ भी सदा ही भासने लगता
है तो फिर स्वयं प्रकाश यह आत्मा एक वार ज्ञान हो जाने पर सदा
ही क्यों न भासने लगेगा ? घटादि का निश्चय जब एक बार हो
जाता है तब उसके बाद घटज्ञान नष्ट तो हो जाता है परन्तु फिर
जब कभी घट की ज़रूरत होती है, तभी उस घट को ले जा
सकते हैं। उस घट में चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत ही
नहीं होती। ठीक यही बात आत्मा के विषय में भी समझ रखनी
चाहिये—उसमें भी चित्त को स्थिर किये रखना आवश्यक नहीं
है। जब किसी को एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय हो
जाता है तब फिर जब कभी उसे अपेक्षा होती है, तभी वह ज्ञानी
उसके विषय में कथन, मनन या ध्यान आदि कर ही सकता है।
यदि कोई ज्ञानी भी उपासक की तरह लौकिक व्यवहार को भूल
जाता है तो इस भूल को ज्ञान से हुआ मत समझो। यह विस्मरण
तो उसे ध्यान से हुआ है। परन्तु यह ध्यान तो उस ज्ञानी ने
अपनी इच्छा से ही पसन्द कर लिया है। शास्त्र उससे ध्यान
करने को नहीं कहता। मुक्ति तो उसे केवल ज्ञान से ही मिल
चुकी है। यह बात वेदान्तों में अनेक जगह कही गयी है। यदि
तत्वज्ञानी लोग ध्यान न करें तो वे भले ही बाह्य व्यापारों में लगे
रहें। उनकी प्रवृत्ति में किसी तरह की कोई भी रुकावट नहीं