पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५० पंचदशी
का—जो असली कूटस्थ रूप है, उसका प्रत्यक्ष होजाता है। अनु-
भवी लोगों के समझाने से आत्मा के न होने के भ्रान्त विचार तो
सदा के लिए नष्ट होजाते हैं, परन्तु आत्मा के प्रतीत न होने के
जो भ्रान्त विचार हैं वे तो तब नष्ट होते हैं जब समाधिभावना
( तीव्र लगन ) से आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। यह पिछली
अवस्था जब आती है तब ही जीवभाव नष्ट होता है और सब
शोक छिप जाते हैं। अपने नित्यमुक्तपने की नष्ट स्मृति दुबारा
जाग उठती है। इसी अवस्था को ध्यान में रखकर कहा है कि
“आत्मा को यदि जाना जाय कि यह तत्त्व मैं हूँ”। यों तो आत्मा
स्वयंप्रकाश तत्व है ही, परन्तु इतने से साधक का कुछ भी उप-
कार नहीं होता। जब साधक की बुद्धि आत्मा के इस स्वयंप्रकाशपने
को अनुभव (महसूस) भी करले तब उस अवस्था की ओर को इस
श्लोक में संकेत (इशारा) किया है कि 'यह मैं हूँ।' 'तू ही तो दसवाँ
है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है, तब खोया हुआ
दसवां उसके सामने आ खड़ा होता है। इसी प्रकार 'आत्मा
ब्रह्म है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है तब आत्मा
और ब्रह्म के एक होने की बात आंखों के सामने आखड़ी होती
है। दसवां कौन सा है ? इस प्रश्न के उत्तर में जब दसवां तू ही
है, यह कहा जाता है और जब शेष नौ के साथ मिलाकर अपने
आपको गिना जाता है, तब अपने आपके दसवेंपन की स्मृति
जाग उठती है। अब आप उसे हज़ार बार नदी में को निकाल
लीजिये और गिनवाइये अब वह दसवें को कभी भी नहीं भूलेगा।
क्योंकि उसे दसवें का अनुभवपूर्ण ज्ञान हो चुका है । इसी प्रकार
विचार के द्वारा जब आत्मा के व्यापक होने का ज्ञान अनुभव का
रूप धारण कर लेता है—या यों कहिये कि जब इस ज्ञान का