पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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वह सब सूक्ष्म देहों में अहंभाव रखता है। 'इच्छा' 'ज्ञान' तथा
'क्रिया' नाम की शक्तियें इसमें रहती हैं। मन्द अंधेरे में जगत्
जैसे अस्पष्ट दीखता है वैसा ही अस्पष्ट संसार इस 'सूत्रात्मा'
में दीखता है। अंकुर फूटने वाले पौधे की जो अवस्था होती है
वही अवस्था इस 'सूत्रात्मा' (हिरण्यगर्भ) की है।
'विराट्' नाम की जो तीसरी अवस्था है वह तो धूप में
चमकते हुए संसार की-सी है। संसार के बड़े से बड़े और छोटे
से छोटे जो भी जड या चेतन पदार्थ हैं वे सब के सब छोटे
या बड़े ईश्वर तत्व ही तो हैं। जमी तो लोक में जब कोई किसी
की विपत्ति को टाल देता है तब कहते हैं कि तुम तो मेरे ईश्वर
होकर आये हो। अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्। यह
सारा संसार इन छोटे बड़े ईश्वरों की पूजा ही तो कर रहा है
तथा इन ईश्वरों में जितनी शक्ति है, यह उनसे उतना ही छोटा
या बड़ा फल भी पा रहा है। यह सब कुछ है परन्तु ईश्वरों की
पूजा से मुक्ति नाम का महाफल तो कभी भी मिलने वाला नहीं
'है। मुक्ति तो ब्रह्मतत्व को जान लेने से ही मिलेगी। जैसे अपने
जागे बिना अपना स्वप्न नहीं टूटता इसी प्रकार आत्मज्ञान के
बिना यह भवबन्धन कटेगा नहीं। अद्वितीय ब्रह्मतत्व में यह
सब जगत् एक महास्वप्न है। इस सुपने में कोई 'ईश्वर' है
कोई 'जीव' है कोई 'चेतन' है और कोई 'जड' है। 'आनन्द ॰
मय' ईश्वर है तथा 'विज्ञानमय' जीव है। ईश्वरतत्व अस्पष्ट होता
है जीवतत्व स्पष्ट होता है। ये दोनों ही माया के बनाये हुए हैं
इनसे अगले संसार को इन दोनों ने ही बनाया है। माया के
खिलौने जो 'जीव' और 'ईश्वर' हैं उनके विषय में तो विवाद
बहुत होते रहते हैं, परन्तु असंग रहने वाला जो अद्वितीय ब्रह्म