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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 626

३८ पञ्चदशी

शेष रह जायगा—तब कैवल्य आ धमकेगा। आत्मतत्व केवल
रूप में ज्योंही आ विराजेगा त्यों ही विचार स्वयं छूट जायगा।
आत्मतत्व को केवल रूप में लाने के लिये विचार की सहायता
की ज़रूरत पड़ती है, उसके लिये आत्मतत्व पर थोड़ा सा विचार
करलें। 'कूटस्थ' और 'जीव' तथा 'ब्रह्म' और 'ईश्वर' यों चार
तरह का चेतन,चेतनतत्व को समझने के लिये कल्पित कर लिया
है। दोनों देहों के अन्दर जो चेतना रहती है, उसमें तो कभी भी
कोई विकार नहीं आता। उतनी चेतना 'कूटस्थ' चेतना
कहाती है। उस कूटस्थ चेतना में पहले बुद्धि की कल्पना हुई,
फिर उसमें चेतना का प्रतिबिम्ब पड़ा; फिर उसमें प्राणशक्ति उत्पन्न
हुई, बस यही जीव है। यही संसार में फंसने वाली चीज़ है।
इसने अन्दर के कूटस्थ चेतन को पूरा पूरा ढक डाला है। अब
तो यह इस तत्व को पृथक् रूप में कभी भी नहीं जानता।
इसका यह न जानना, अनादि काल से है। यही 'मूलाज्ञान'
कहाता है। यह अज्ञान दो रूप में काम करता है—एक तो यह
स्वरूप को ढकता है, दूसरे यह स्वरूप को किसी विकृतरूप में
(शरीर आदि के रूप में) दिखाता है। यही 'आवरण' और
'विक्षेप है'। आवरण से अपने रूप की प्रतीति रुक जाती है--
अपना आपा दूसरे पदार्थों में रिलमिल जाता है। ये दोनों ही
बातें तत्वज्ञान होते ही नष्ट हो जाती हैं। परन्तु विक्षेप के नष्ट
होने में, तत्वज्ञान के बाद भी कुछ समय लगता है। क्योंकि
विक्षेप की उत्पत्ति कर्मों से और अज्ञान से, दो से मिल कर होती
है। कर्मों का प्रभाव जितने दिनों तक रहना चाहिये, उतने दिन
रहकर ही विक्षेप नष्ट होता है। यही कारण है कि ज्ञान हो
जाने पर भी ज्ञानी का प्रारब्ध कर्म नष्ट नहीं होता। आत्मा के