पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context३२ पञ्चदशी
होता है ऐसी निस्तेज वाणी से बोले हुए 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि .
महावाक्य उसी तरह बन्धनकारक होते हैं, जिस प्रकार अन्य
अपशब्द बन्धनकारक होते हैं। क्योंकि अनुभव रहित पुरुष जब
इन महावाक्यों को कहते हैं तब वे आत्मघात कर बैठते हैं क्योंकि
उनमें दम्भ आदि दोष बहुतायत से उत्पन्न हो जाते हैं।
मुख्य महावाक्य. चार हैं। एक 'प्रज्ञानं ब्रह्म' दूसरा
'अहं ब्रह्मास्मि' तीसरा 'तत्त्वमसि' चौथा 'अयमात्मा ब्रह्म'
ब्रह्म और आत्मा की एकता रूप जो मोक्ष का साधन है-उसका
ज्ञान इन ( या इन जैसे ) वाक्यों से ही हो पाता है। आत्मा
सच्चिदानन्द स्वरूप है, यह ज्ञान तो युक्ति से भी हो जाता
है। परन्तु 'यह आत्मा और वह ब्रह्म तत्व दोनों एक ही तत्व
हैं, इस बात को जानने का उपाय शब्द प्रमाण के अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं है।
प्रज्ञानँ ब्रह्म
चक्षु और श्रोत्र के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर
निकलती है, उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा ज्ञान है,
उसी से तो यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता है और
शब्दों को सुना करता है। नासिका के द्वारा जो अन्तःकरण की
वृत्ति बाहर निकलती है अन्तःकरण की उस वृत्ति से उपहित जो
चैतन्य किंवा प्रज्ञान है, उसी प्रज्ञान से तो यह संसार भले बुरे
गन्धों को सूँघा करता है। वागिन्द्रिय से ढके हुए उसी
चैतन्य किंवा प्रज्ञान से ये सब शब्द बोले जाते हैं। रसना के
द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है, उसको जिस
चैतन्य ने अपनी उपाधि बना लिया है, उसी से तो ये स्वादु
या अस्वादु रस पहचाने जाते हैं। इतना ही नहीं और भी