पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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ही अच्छा था। तत्त्वज्ञान का इतना तो दृष्टफल होना ही
चाहिये कि तत्त्वज्ञानी का व्यवहार उसका रहन सहन, उसकी
बात-चीत, सब में अलौकिकपना हो और उसके व्यवहार से
उसकी पूजा हो, लोग उसको श्रद्धा से देखें। कामादि के साथ
ही साथ, सब दोषों के मूल मनोराज्य को भी, बन्द कर देना
चाहिये। मनोराज्य को जीतने के लिये निर्विकल्प समाधि करनी
चाहिये। सविकल्प समाधि करने से निर्विकल्प समाधि होने
लगती है। जिसको तत्व का ज्ञान हो जाय, जो एकान्त वास
करता हो अर्थात् हृदय में बहुतायत से रहने लग पड़ा हो,
जिसके बुद्धि दोष नष्ट हो गये हों वह, लम्बे प्रणवों को बोलकर
मनोराज्य को जीत सकता है।
जब मनोराज्य पर विजय मिल जाती है तब साधक के वृत्ति-
शून्य मनकी हालत गूँगे पुरुष की-सी हो जाती है। गूँगा जैसे
कुछ भी नहीं बोलता इसी प्रकार उसके गूँगे मन में वृत्तियों का
उत्पन्न होना रुक जाता है। 'दृश्य नहीं है' इस ज्ञानरूपी झाडू
को पकड़ कर, मनरूपी मन्दिर में से, दृश्यरूपी कूड़े को निकाल
कर, फेंक दिया जाय तो निरतिशय मोक्ष सुख अन्दर से उमड़
ही पड़ता है। कामादि अवस्थाओं के नष्ट हो जाने पर, जब
वासनाओं से शून्य गम्भीर मौनावस्था का प्रादुर्भाव हो जाता
है, तब इस दशा से उत्तम दशा और कोई भी नहीं है। ऐसा
परमपद जिन लोगों ने पा लिया हो, उनको भी कभी-कभी भोग-
दायी कर्मों के प्रभाव से विक्षेप हो ही जाता है। परन्तु उनके
अभ्यास की प्रबलता उस विक्षेप को ठहरने ही नहीं देती।
उनकी बुद्धि फिर तुरन्त ही समाहित हो जाती है। हाँ जिन
महापुरुषों को विक्षेप होना सर्वथा बन्द हो गया हो, उनको तो